आर्थिक संकट से वैश्विक शक्ति तक: 1991 के सुधारों की कहानी
साल 1991 में देश एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा था, जहां आगे का रास्ता धुंधला दिखाई दे रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर था। हालात इतने गंभीर थे कि भारत के पास केवल कुछ सप्ताह तक आयात करने लायक विदेशी मुद्रा बची थी। महंगाई बढ़ रही थी, सरकारी खजाने पर दबाव था और अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम सी गई थी। देश संकट में था और सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल था- क्या भारत इस आर्थिक तूफान से निकल पाएगा?
इसी बीच आम चुनावों के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजिव गाँधी की हत्या ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। चुनावों के बाद कांग्रेस सरकार बनी और पी वी नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद संभाला। प्रधानमंत्री बनते ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की थी।
नरसिम्हा राव जानते थे कि इस संकट से निपटने के लिए केवल राजनीतिक अनुभव पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसकी पहचान एक विश्वसनीय अर्थशास्त्री और प्रशासक के रूप में हो। उनकी नजर डॉ. मनमोहन सिंह पर गई, जो उस समय सक्रिय राजनीति में नहीं थे, लेकिन देश के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में गिने जाते थे। वे मुख्य आर्थिक सलाहकार, वित्त सचिव, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर और प्लानिंग कमिशन के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके थे।
कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने स्वयं मनमोहन सिंह को बुलाकर देश की गंभीर आर्थिक स्थिति से अवगत कराया और वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। देशहित को सर्वोपरि मानते हुए मनमोहन सिंह ने यह जिम्मेदारी स्वीकार की और 21 जून 1991 को पहली बार भारत के वित्त मंत्री बने। इसके बाद शुरू हुई भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े बदलाव की कहानी।
जुलाई 1991 में संसद में बजट पेश करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने एक नए आर्थिक युग की शुरुआत की। उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति को आगे बढ़ाने का ऐलान किया। यह केवल आर्थिक सुधार नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक सोच में एक बड़ा बदलाव था।
उस समय उद्योग शुरू करने के लिए सरकारी मंजूरियों का लंबा सिलसिला था, जिसे आमतौर पर "लाइसेंस राज" कहा जाता था। नई नीति के तहत इन प्रतिबंधों में ढील दी गई, उद्योगों को अधिक स्वतंत्रता दी गई और सरकारी नियंत्रण कम किए गए।
लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।
सुधारों का विरोध केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी हो रहा था। कई नेताओं को डर था कि विदेशी कंपनियों के आने से भारतीय उद्योग प्रभावित होंगे। ऐसे माहौल में नरसिम्हा राव ने राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने विरोध के बीच सुधारों को आगे बढ़ाया और सरकार तथा संसद में आवश्यक समर्थन सुनिश्चित किया। विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि यदि मनमोहन सिंह 1991 के आर्थिक सुधारों के वास्तुकार थे, तो नरसिम्हा राव उनके सबसे बड़े राजनीतिक संरक्षक थे। एक ने आर्थिक खाका तैयार किया, तो दूसरे ने उसे जमीन पर उतारने का रास्ता बनाया।
इन्हीं सुधारों का सबसे बड़ा असर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर पड़। 1991 से पहले भारत में विदेशी निवेशकों के लिए कारोबार करना आसान नहीं था। कई क्षेत्रों में प्रतिबंध थे और अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल थी। उदारीकरण के बाद सरकार ने नियमों को सरल बनाया और कई क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया।
धीरे-धीरे दुनिया की बड़ी कंपनियों ने भारत की ओर रुख करना शुरू किया। विदेशी निवेश के साथ नई तकनीक, आधुनिक प्रबंधन प्रणाली और वैश्विक बाजारों तक पहुंच भी भारत आई। ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग और विनिर्माण क्षेत्रों में बड़े बदलाव दिखाई देने लगे। नई फैक्ट्रियां खुलीं, रोजगार के अवसर बढ़े और भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुरूप खुद को विकसित करने का मौका मिला। भारत का आईटी क्षेत्र वैश्विक पहचान बनाने लगा और सेवा क्षेत्र तेजी से विस्तार करने लगा।
हालांकि इस बदलाव के साथ बहस भी चलती रही। कुछ विशेषज्ञों ने आर्थिक असमानता, छोटे उद्योगों पर दबाव और क्षेत्रीय विषमताओं जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि 1991 के सुधार नहीं हुए होते, तो भारत की आर्थिक प्रगति की गति कहीं धीमी होती। आज, तीन दशक से अधिक समय बाद जब भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है और वैश्विक निवेशकों की पसंदीदा मंजिलों में शामिल है, तब 1991 की वह कहानी फिर याद आती है।
यह केवल आर्थिक सुधारों की कहानी नहीं है। यह उस समय की कहानी है जब एक गंभीर संकट ने बदलाव की जरूरत पैदा की, बदलाव ने उदारीकरण को जन्म दिया, उदारीकरण ने FDI का रास्ता खोला और FDI ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई पहचान दिलाई और इस पूरी कहानी के केंद्र में दो नाम हमेशा याद किए जाते है- पी.वी. नरसिम्हा राव, जिन्होंने राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई, और डॉ. मनमोहन सिंह, जिन्हें संकट की घड़ी में वित्त मंत्री बनाकर देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
भारत की आधुनिक आर्थिक यात्रा का यह अध्याय आज भी इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कभी-कभी सबसे बड़े संकट ही सबसे बड़े बदलावों की शुरुआत बन जाते हैं।
