जो भी भक्त यहाँ सच्चे मन से आता है, वो खाली हाथ वापस नहीं जाता। हर साल यहां लाखों लोग मां का आर्शीवाद लेने पहुंचते हैं और माँ सबकी मनोकामनाएं पूरी करती है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 11 किलोमीटर दूर खूबसूरत पहाड़ की चोटी पर स्थित माँ तारा देवी मंदिर माता रानी के अद्भुत चमत्कारों के लिए मशूहर है। प्रकृति की गोद में स्थित लगभग 250 वर्ष पुराना त्रिगुणात्मक शक्तिपीठ धाम तारादेवी मंदिर पुरे भारत वर्ष के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर के साथ करीब दो किलोमीटर नीचे जंगल में शिवबावड़ी भी है। मान्यता है कि इस बावड़ी में पैसे अर्पण करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। तारादेवी मंदिर के निर्माण की कहानी बड़ी भी बेहद रोचक है। इस मंदिर का निर्माण जुन्गा क्योंथल नरेश राजा भूपेंद्र सेन ने करवाया था। भूपेंद्र सेन सेन वंश के सबसे ताकतवार राजाओं में से एक थे। कहा जाता है कि एक बार राजा भूपेंद्र सेन शिकार के लिए तारादेवी के घने जंगलों में चले गए। इसी दौरान उन्हें मां तारा और भगवान हनुमान के दर्शन हुए। मां तारा ने इच्छा जताई कि वह इस स्थल में बसना चाहती हैं, ताकि भक्त यहां आकर आसानी से उनके दर्शन कर सके। राजा ने भी हामी भर दी। इसके बाद राजा ने अपनी आधी से ज्यादा जमीन मंदिर निर्माण के लिए सौंप दी और यहां मंदिर निर्माण का काम शुरू हो गया। कुछ समय बाद जब मां का मंदिर तैयार हुआ तो राजा ने लकड़ी की मूर्ति के स्वरूप में यहां माता को स्थापित कर दिया। कहते हैं भूपेंद्र सेन के बाद मां ने उनके वशंज बलबीर सेन को भी दर्शन दिए। सेन ने यहां अष्टधातु की मूर्ति स्थापित की और मंदिर का निर्माण आगे बढ़ाया। इसलिए विशेष है माँ तारा देवी का मंदिर:- माँ तारा देवी जुन्गा क्योंथल नरेश की कुलदेवी है। मंदिर में माँ तारा देवी की अष्टधातु की मूर्ति विराजमान है। कहा जाता है कि 250 साल पहले मां तारा की प्रतिमा को पश्चिम बंगाल से लाया गया था। राजा भूपेंद्र सेन ने अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा मंदिर बनवाने के लिए दान किया था। कुछ समय बाद मंदिर का काम पूरा हो गया और लकड़ी की बनी मां की मूर्त यहां स्थापित कर दी गई। राजा भूपेंद्र सेन के बाद राज बलबीर सेन को भी मां ने दर्शन दिए जिसके बाद सेन ने अष्टधातु की मूर्त यहां स्थापित की और मंदिर का निर्माण किया। जुन्गा का राज परिवार हर साल नवरात्र उत्सव के अष्टमी के दिन यहां पूजा करने आते हैं उस समय मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यहां गांव में जब भी कोई फसल या अन्य चीजें तैयार होती है तो सबसे पहले मां के चरणों में समर्पित की जाती है। चोटी पर बने इस मंदिर के एक ओर घने जंगल है जबकि दूसरी ओर सड़कें। यह मंदिर अब बस सेवा से भी जुड़ गया है। इस मंदिर में लोग श्रद्धा भाव से मंदिर में भंडारे करवाते हैं। अगर किसी श्रद्धालु को मंदिर में भंडारा करवाना है तो लंबा इंतजार करना पड़ता है।भंडारे के दिन की डेट अलॉट होने के एक दिन पहले लोगों को यहां राशन छा़ेड़ना होता है। मंदिर प्रबंधक का कहना है कि जो भी भक्त यहां भंडारा देना चाहते हैं वह मंदिर कार्यालय समय में सुबह दस बजे से पांच बजे आकर बुकिंग कर सकता है। देवी दुर्गा के 108 नाम 1. सती : अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली 2. साध्वी : आशावादी 3. भवप्रीता : भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली 4. भवानी : ब्रह्मांड की निवास 5. भवमोचनी : संसार बंधनों से मुक्त करने वाली 6. आर्या : देवी 7. दुर्गा : अपराजेय 8. जया : विजयी 9. आद्य : शुरूआत की वास्तविकता 10. त्रिनेत्र : तीन आँखों वाली 11. शूलधारिणी : शूल धारण करने वाली 12. पिनाकधारिणी : शिव का त्रिशूल धारण करने वाली 13. चित्रा : सुरम्य, सुंदर 14. चण्डघण्टा : प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली 15. महातपा : भारी तपस्या करने वाली 16. मन : मनन- शक्ति 17. बुद्धि : सर्वज्ञाता 18. अहंकारा : अभिमान करने वाली 19. चित्तरूपा : वह जो सोच की अवस्था में है 20. चिता : मृत्युशय्या 21. चिति : चेतना 22. सर्वमन्त्रमयी : सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली 23. सत्ता : सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है 24. सत्यानन्दस्वरूपिणी : अनन्त आनंद का रूप 25. अनन्ता : जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं 26. भाविनी : सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत 27. भाव्या : भावना एवं ध्यान करने योग्य 28. भव्या : कल्याणरूपा, भव्यता के साथ 29. अभव्या : जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं 30. सदागति : हमेशा गति में, मोक्ष दान 31. शाम्भवी : शिवप्रिया, शंभू की पत्नी 32. देवमाता : देवगण की माता 33. चिन्ता : चिन्ता 34. रत्नप्रिया : गहने से प्यार 35. सर्वविद्या : ज्ञान का निवास 36. दक्षकन्या : दक्ष की बेटी 37. दक्षयज्ञविनाशिनी : दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली 38. अपर्णा : तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली 39. अनेकवर्णा : अनेक रंगों वाली 40. पाटला : लाल रंग वाली 41. पाटलावती : गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली 42. पट्टाम्बरपरीधाना : रेशमी वस्त्र पहनने वाली 43. कलामंजीरारंजिनी : पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली 44. अमेय : जिसकी कोई सीमा नहीं 45. विक्रमा : असीम पराक्रमी 46. क्रूरा : दैत्यों के प्रति कठोर 47. सुन्दरी : सुंदर रूप वाली 48. सुरसुन्दरी : अत्यंत सुंदर 49. वनदुर्गा : जंगलों की देवी 50. मातंगी : मतंगा की देवी 51. मातंगमुनिपूजिता : बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय 52. ब्राह्मी : भगवान ब्रह्मा की शक्ति 53. माहेश्वरी : प्रभु शिव की शक्ति 54. इंद्री : इन्द्र की शक्ति 55. कौमारी : किशोरी 56. वैष्णवी : अजेय 57. चामुण्डा : चंड और मुंड का नाश करने वाली 58. वाराही : वराह पर सवार होने वाली 59. लक्ष्मी : सौभाग्य की देवी 60. पुरुषाकृति : वह जो पुरुष धारण कर ले 61. विमिलौत्त्कार्शिनी : आनन्द प्रदान करने वाली 62. ज्ञाना : ज्ञान से भरी हुई 63. क्रिया : हर कार्य में होने वाली 64. नित्या : अनन्त 65. बुद्धिदा : ज्ञान देने वाली 66. बहुला : विभिन्न रूपों वाली 67. बहुलप्रेमा : सर्व प्रिय 68. सर्ववाहनवाहना : सभी वाहन पर विराजमान होने वाली 69. निशुम्भशुम्भहननी : शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली 70. महिषासुरमर्दिनि : महिषासुर का वध करने वाली 71. मधुकैटभहंत्री : मधु व कैटभ का नाश करने वाली 72. चण्डमुण्ड विनाशिनि : चंड और मुंड का नाश करने वाली 73. सर्वासुरविनाशा : सभी राक्षसों का नाश करने वाली 74. सर्वदानवघातिनी : संहार के लिए शक्ति रखने वाली 75. सर्वशास्त्रमयी : सभी सिद्धांतों में निपुण 76. सत्या : सच्चाई 77. सर्वास्त्रधारिणी : सभी हथियारों धारण करने वाली 78. अनेकशस्त्रहस्ता : हाथों में कई हथियार धारण करने वाली 79. अनेकास्त्रधारिणी : अनेक हथियारों को धारण करने वाली 80. कुमारी : सुंदर किशोरी 81. एककन्या : कन्या 82. कैशोरी : जवान लड़की 83. युवती : नारी 84. यति : तपस्वी 85. अप्रौढा : जो कभी पुराना ना हो 86. प्रौढा : जो पुराना है 87. वृद्धमाता : शिथिल 88. बलप्रदा : शक्ति देने वाली 89. महोदरी : ब्रह्मांड को संभालने वाली 90. मुक्तकेशी : खुले बाल वाली 91. घोररूपा : एक भयंकर दृष्टिकोण वाली 92. महाबला : अपार शक्ति वाली 93. अग्निज्वाला : मार्मिक आग की तरह 94. रौद्रमुखी : विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा 95. कालरात्रि : काले रंग वाली 96. तपस्विनी : तपस्या में लगे हुए 97. नारायणी : भगवान नारायण की विनाशकारी रूप 98. भद्रकाली : काली का भयंकर रूप 99. विष्णुमाया : भगवान विष्णु का जादू 100. जलोदरी : ब्रह्मांड में निवास करने वाली 101. शिवदूती : भगवान शिव की राजदूत 102. करली : हिंसक 103. अनन्ता : विनाश रहित 104. परमेश्वरी : प्रथम देवी 105. कात्यायनी : ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय 106. सावित्री : सूर्य की बेटी 107. प्रत्यक्षा : वास्तविक 108. ब्रह्मवादिनी : वर्तमान में हर जगह वास करने वाली
यहाँ भगवान भोलेनाथ सिर्फ सिगरेट का कश ही नहीं लगाते बल्कि सिगरेट के धुएं को हवा में भी उड़ाते हैं। ये सुनने में भले ही अजीब लगे मगर महादेव के भक्त तो यही मानते है। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन की अर्की तहसील में स्थित लुटरू महादेव मंदिर की। पहाड़ियों पर प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां दर्शन के लिए आनेवाले सभी भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग को सिगरेट अर्पित करते हैं। शिवलिंग पर सिगरेट अर्पित करने के बाद उसे कोई सुलगाता नहीं है बल्कि वो खुद-ब-खुद सुलगती है।बाकायदा सिगरेट से धुआं भी निकालता हैं, मानो स्वयं भोले बाबा सिगरेट के कश लगा रहे हो। हालांकि कुछ लोग इसमें विज्ञान तलाश इसे अंधविश्वास भी करार देते हैं, किन्तु भोले के भक्तों के लिए तो ये शिव की महिमा हैं। आखिर भक्त और भगवान को विश्वास ही तो जोड़ता हैं। लुटरू महादेव मंदिर का निर्माण सन 1621 में करवाया गया था। कहा जाता हैं कि बाघल रियासत के तत्कालीन राजा को भोलेनाथ ने सपने में दर्शन देकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया था। एक मान्यता ये भी हैं कि स्वयं भगवान शिव कभी इस गुफा में रहे थे। आग्रेय चट्टानों से निर्मित इस गुफा की लम्बाई पूर्व से पश्चिम की तरफ लगभग 25 फ़ीट तथा उत्तर से दक्षिण की ओर 42 फ़ीट है। गुफा की ऊंचाई तल से 6 फ़ीट से 30 फ़ीट तक है।गुफा के अंदर मध्य भाग में 8 इंच लम्बी प्राचीन प्राकृतिक शिव की पिंडी विधमान है। इसलिए विशेष हैं लुटरू महादेव मंदिर:- लुटरू महादेव मंदिर में सदियों से शिवलिंग को सिगरेट पिलाई जा रही है। भक्त इसे चमत्कार मानते हैं, तो कुछ लोग इसे विज्ञान करार देते हैं, पर यहाँ सच में ऐसा होता आ रहा हैं। लुटरू महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग भी अपने आप में बेहद अनोखा है। शिवलिंग पर जगह- जगह गड्ढे बने हैं और इन्हीं गड्ढों में लोग सिगरेट को फंसा देते हैं। लुटरू महादेव गुफा की छत में परतदार चट्टानों के रूप में भिन्न भिन्न लंबाइयों के छोटे छोटे गाय के थनो के अकार के शिवलिंग हैं। मान्यता के अनुसार इनसे कभी दूध की धारा बहती थी। शिवलिंग के ठीक ऊपर एक गुफा पर छोटा सा गाय के थन के जैसा एक शिवलिंग बना है ,जहाँ से पानी की एक-एक बूँद ठीक शिवलिंग के ऊपर गिरती रहती है। लुटरू गुफा को भगवान परशुराम की कर्मस्थली भी कहा जाता हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार सहस्त्र बाहु का वध करने के बाद भगवान परशुराम ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी। पंजाब के चमकौर साहिब के शिवमंदिर के महात्मा शीलनाथ भी करीब चार दशक पूर्व लुटरू महदेव में आराधना करते थे। शिवलिंग पर जलते हुए सिगरेट के अद्भुत नज़ारे को देखने के बाद लोग इसे कैमरे में कैद करने से खुद को नहीं रोक पाते है और ऐसा करने पर कोई पाबंदी भी नहीं हैं। वर्ष 1982 में केरल राज्य में जन्मे महात्मा सन्मोगानन्द सरस्वती जी महाराज लुटरू महादेव मंदिर में पधारे। उनकी समाधि भी यही बनी हुई है। गुफा के नीचे दूर- दराज से आने वाले भक्तों के लिए धर्मशाला भी बनाई गई हैं । शिव की लीला शिव ही जानें भोलेनाथ शिवशंकर की लीला तो वे स्वयं ही जानते हैं किन्तु लुटरू महादेव मंदिर में शिवलिंग का सिगरेट पीना किसी अचम्भे से कम नहीं हैं। यदि वैज्ञानिक कारण भी हैं तो ऐसा सिर्फ शिवलिंग पर सिगरेट चढाने से ही क्यों होता हैं। न भक्तों की आस्था पर कोई प्रश्न हैं और न ही शिव की महिमा पर। अब ऐसा क्यों होता हैं और कैसे होता हैं, ये तो स्वयं शिव ही जाने।


