1836 से स्थापित सुबाथू उप डाकघर का मुख्य द्वार खस्ताहाल
ब्रिटिश काल में स्थापित सुबाथू उप डाकघर को प्रदेश का पहला डाकघर माना जाता है। हालांकि किसी अधिकृत दस्तावेज में इसके प्रदेश का पहला डाकघर होने का उल्लेख नहीं है, लेकिन अंबाला से कालका और कालका से खच्चरों में सुबाथू उप डाकघर तक चिठ्ठी आने का इतिहास सर्वविदित है। माना जाता है कि ये 1836 में स्थापित हुआ था।
स्वर्गीय ज्योतिषचार्य एवं प्रसिद्द लेखक मदन गुप्ता स्पाटू के अनुसार डाक के थैले कलकत्ता से दिल्ली, फिर अंबाला और कालका पहुँचाए जाते थे। कालका से, थैलों को खच्चरों पर लादकर कसौली और फिर सुबाथू ले जाया जाता था। यहाँ तक कि इन थैलों को ढोने के लिए हरकारे भी रखे जाते थे, जिन्हें कंधे पर रखी बाँस की छड़ पर बाँधकर कुछ मील चलने के बाद बदल दिया जाता था। बाद में, ब्रिटिश डाक के संचालन के लिए सुबाथू में एक छोटा सा डाकघर अस्तित्व में आया। 1856 में जब हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग खुला, तो डाक के थैलों को तांगों या बैलगाड़ियों पर धर्मपुर से सुबाथू छावनी तक पहुँचाया जाता था। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार कभी चिट्ठी कम होती तो लाठी पर बैग लटका कर डाकिया भी डाक लाता।
तकनीक के इस दौर में इतिहास को सैंकड़ो वर्षों से समेटे सुबाथू डाकघर आज खस्ताहाल है। आलम यह है की सुबाथू उप डाकघर के मुख्य द्वार का गेट जर्जर हालत में है। वर्षों से रंग रोगन को तरसता हुआ। भारतीय डाक विभाग इस ऐतिहासिक धरोहर के इतिहास को संजोए रखने में नाकाम साबित हो रहा है। स्थानीय लोगो ने भारतीय डाक विभाग के उच्चाधिकारियों से मांग की है की जल्द से जल्द सुबाथू उप डाकघर के गेट पर पेंट करवाया जाए , साथ ही गेट के साइड की दोनों दीवारों पर इसका इतिहास भी अंकित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी को ये पता लग सके कि सुबाथू उप डाकघर भी हिमाचल प्रदेश में स्थापित ऐतिहासिक धरोहर में से एक है। इस बारे पोस्टमास्टर बी एस नेगी ने बताया की मुख्यद्वार के पेंट के लिए कोटेशन मांगी गई है। जल्द ही पेंट का काम शुरू होगा। जहाँ तक उप डाकघर के इतिहास लिखने की बात है इस विशेष को उच्चाधिकारियों के समक्ष रखा जायेगा।
