* 40 पैसे प्रति किलो की हुई कटौती HPMC ने बागवानों को बड़ी राहत देते हुए CA स्टोर में सेब रखने के किराए में कटौती की है। HPMC अपने स्टोर में सेब रखने की एवज में 2 रुपए प्रति किलो के हिसाब से चार्ज करता था, पर इस सीजन में बागवानों से 1 रुपए 60 पैसे के हिसाब से किराया लिया जाएगा। इस तरह 20 प्रतिशत की कमी की गई है और प्रति किलो किलो के हिसाब से 40 पैसे की कटौती हुई है। प्रदेश के सेब बहुल क्षेत्रों में HPMC के 6 कोल्ड स्टोर है। दिलचस्प बात ये है कि इन स्टोर में कई चैंबर हर साल खाली रह जाते थे। दरअसल प्राइवेट CA स्टोर की तुलना में HPMC के स्टोर के रेट ज्यादा थे। पर अब HPMC ने भी अपने रेट कम कर दिए है। अगस्त के दूसरे पखवाड़े के बाद अमुमम बाजार में सेब के बाजार भाव गिर जाते हैं। ऐसे में सेब को स्टोर किया जाता है, ताकि ऑफ सीजन में अच्छे दाम पर बेचा जा सके। जाहिर है HPMC के इस कदम का लाभ बागवानों को होगा।
**मुख्यमंत्री ने करार रद्द करने के दिए निर्देश **जुलाई से कंप्यूटर शिक्षकों के वेतन में 2,000 रुपये की बढ़ोतरी हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कार्यरत 1326 कंप्यूटर शिक्षक अब निजी कंपनियों के अधीन नहीं रहेंगे। सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कंपनियों के साथ हुए करार को रद्द करने के निर्देश दिए हैं। साह ही जुलाई से कंप्यूटर शिक्षकों के वेतन में 2,000 रुपये की बढ़ोतरी करने की घोषणा भी की। सीएम ने शिक्षक भर्ती से संबंधित कोर्ट में लंबित मामले को भी जल्द निपटाने में मदद का भी आश्वासन दिया है। अगर कोई व्यवस्था नहीं होती है तो शिक्षकों को पूर्व की तरह नाइलेट कंपनी के अधीन ही किया जाए। पांच निजी कंपनियों को ठेका दिए जाने पर भी मुख्यमंत्री ने आपत्ति जताई। सरकारी स्कूलों में कार्यरत कंप्यूटर शिक्षकों को आउटसोर्स आधार पर नियुक्ति दी गई है। बीते कई वर्षों से नाइलेट कंपनी के अधीन शिक्षक रखे गए हैं। पर कुछ माह पूर्व कंप्यूटर शिक्षकों को इलेक्ट्राॅनिक्स काॅरपोरेशन के माध्यम से नियुक्त करने का फैसला लिया गया था। काॅरपोरेशन स्वयं कोई भी भर्ती नहीं करता है, ऐसे में पांच निजी कंपनियों के तहत शिक्षकों का बंटवारा किया गया। दरअसल शिक्षकों की हाजिरी भी इन्हीं कंपनियों को भेजी गई। कुछ कंपनियों के शिक्षकों के वेतन से 2,000 से 4,000 रुपये तक की कटौती कर दी। शिक्षकों का आरोप है कि ऐसी कंपनियों को काम दिए गए, जिनका इस क्षेत्र में कोई अनुभव ही नहीं था। इसी के चलते मंगलवार को शिक्षकों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा। शिक्षकों का कहना है कि ऐसी कंपनी को भी शामिल किया गया, जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला विधानसभा सदन में भी गूंजा है। इस दौरान कंप्यूटर शिक्षकों ने सीएम के समक्ष शिक्षा विभाग में शामिल करने की मांग भी रखी।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने 19 जून को कैबिनेट मीटिंग बुलाई है। इसे लेकर सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागीय सचिव और विभागाध्यक्ष को आदेश जारी कर दिए हैं। इसके लिए विभागों से एजेंडा भेजने को कह दिया गया है। बता दें कि पूर्व में यह मीटिंग 18 जून को निर्धारित थी, लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है। माना जा रहा है कि कैबिनेट मीटिंग में नए भर्ती आयोग को लेकर कोई निर्णय हो सकता है। दरअसल, कैबिनेट मीटिंग से 2 दिन पहले 17 जून को भर्ती एजेंसी के गठन को रिटायर आईएएस दीपक सानन की अध्यक्षता में गठित कमेटी की भी बैठक होनी है। कमेटी इसी दिन सरकार को नए आयोग के गठन को लेकर अपनी रिपोर्ट सौप सकती है। यदि ऐसा होता है तो संभावित है कि 19 जून की कैबिनेट में नए चयन आयोग को लेकर सरकार निर्णय ले। विदित रहे कि सुक्खू सरकार ने अप्रैल महीने में कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर को भंग कर दिया था। लगातार हो रहे पेपर लीक और व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए सुक्खू सरकार ने ये एक्शन लिया था। कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर के कई कर्मचारी इसमें लिप्त पाए गए है। कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर के भंग होने के बाद से ही नए चयन आयोग के गठन का इन्तजार है।
पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर मिलेगा आनलाइन परमिट परमिट लेने के लिए 550 रुपये शुल्क देना होगा आज से सैलानी रोहतांग की बर्फीली वादियों का दीदार कर सकेंगे। पर्यटकों के लिए रोहतांग दर्रा बहाल हो गया है। परमिट लेकर सैलानी बर्फीली वादियों का दीदार कर सकेंगे। पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर जाकर आनलाइन परमिट लिया जा सकता है जिसके लिए 550 रुपये शुल्क देना होगा। जिला प्रशासन ने मंगलवार से पर्यटकों के लिए रोहतांग दर्रा बहाल कर दिया है। बर्फबारी के कारण इस साल 38 दिन देरी से दर्रा बहाल किया गया है। पिछले वर्ष पांच मई को पर्यटकों के लिए दर्रा खोल दिया गया था जबकि इस वर्ष 13 जून से इसे बहाल किया गया है। 1200 पर्यटक वाहन ही रोज रोहतांग जा सकेंगे। हर रोज 800 पेट्रोल व 400 डीजल इंजन पर्यटक वाहनों को जाने की अनुमति मिलेगी। दर्रा बहाल होने से टूरिस्ट सीजन भी गति पकड़ेगा।
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अपनी सादगी के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी सादगी की कहानियां जगहाजिर हैं। प्रधानमंत्री बनने तक उनके पास न ही घर था और न कार। अपने ही बेटे का प्रमोशन तक रुकवा दिया था शास्त्री जी ने। लाल बहादुर शास्त्री इतने साधारण थे कि एक बार गृहमंत्री रहते हुए कार से उतरकर गन्ने का जूस पीने लग गये। पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब ‘एक जिंदगी काफी नहीं‘ में जिक्र किया है कि "शास्त्री जी उन दिनों नेहरू मंत्रिमंडल से बाहर हो गए थे। मैं हमेशा की तरह शाम को उनके बंगले में गया, जहां अंधेरा छाया हुआ था। बस ड्राइंग रूम की लाइट जल रही थी। लाल बहादुर शास्त्री ड्राइंग रूम में अकेले बैठे अखबार पढ़ रहे थे। ऐसे में जब मैंने पूछा कि बाहर रोशनी क्यों नहीं थी तो उन्होंने जवाब दिया कि अब बिजली का बिल उन्हें खुद देना पड़ेगा और वे ज्यादा खर्च नहीं उठा सकते। लाल बहादुर शास्त्री जब सरकार से बाहर थे तो आलू महंगा होने के कारण उन्होंने उसे खाना छोड़ दिया था। साल 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने निजी इस्तेमाल के लिए एक फिएट कार खरीदी थी। यह कार उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5000 रुपये लोन लेकर खरीदी थी, लेकिन अफसोस, कार खरीदने के अगले साल ही 11 जनवरी 1966 को उनकी मृत्यु ताशकंद में हो गई थी। आज भी यह कार उनके दिल्ली स्थित निवास पर खड़ी है। पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने कार का लोन जल्दी अप्रूव होने पर पंजाब नेशनल बैंक से कहा था कि यही सुविधा इसी तरह आम लोगों को भी मिलनी चाहिए। शास्त्री जी के निधन के बाद बैंक ने उनकी पत्नी को बकाया लोन चुकाने के लिए पत्र लिखा था। इस पर उनकी पत्नी ललिता देवी ने बाद में फैमिली पेंशन की मदद से बैंक का एक-एक रुपया चुकाया था।
गांधीवादी गुलजारी लाल नंदा दो बार भारत के कार्यवाहक-अंतरिम प्रधानमंत्री रहे। एक बार विदेश मंत्री भी बने थे। आजादी की लड़ाई में गांधी के अनन्य समर्थकों में शुमार नंदा को अपना अंतिम जीवन किराये के मकान में गुजारना पड़ा। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में 500 रुपये की पेंशन स्वीकृत हुई थी। उन्होंने इसे लेने से यह कह कर इनकार कर दिया था कि पेंशन के लिए उन्होंने लड़ाई नहीं लड़ी थी। बाद में मित्रों के समझाने पर कि किराये के मकान में रहते हैं तो किराया कहां से देंगे, उन्होंने पेंशन कबूल की थी। कहते है किराया बाकी रहने के कारण एक बार तो मकान मालिक ने उन्हें घर से निकाल भी दिया था। बाद में इसकी खबर अखबारों में छपी तो सरकारी अमला पहुंचा और मकान मालिक को पता चला कि उसने कितनी बड़ी भूल कर दी है। आज तो ऐसे नेता की कल्पना भी नहीं की जा सकती जो पीएम और केंद्रीय मंत्री रहने के बावजूद अपने लिए एक अदद घर नहीं बना सका और किराये के मकान में अपनी जिंदगी गुजार दी। दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारीलाल नंदा सक्रिय राजनीति को अलविदा करने के बाद दिल्ली में किराए के मकान में रहते थे और उनके पास किराया भी नहीं होता था। जब वे किराया नहीं दे सके तो उनकी बेटी उन्हें अपने साथ अहमदाबाद ले गईं। गुलजारीलाल नंदा मुंबई विधानसभा के दो बार सदस्य रहे थे। पहली बार वह 1937 से 1939 तक और दूसरी बार 1947 से 1950 तक विधायक चुने गये थे। उनके जिम्मे श्रम एवं आवास मंत्रालय का कार्यभार था, तब मुंबई विधानसभा होती थी। 1947 में नंदा की देखरेख में ही इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना हुई। मुंबई सरकार में गुलजारीलाल नंदा के काम से प्रभावित होकर उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली बुला लिया। फिर नंदा वह 1950-1951, 1952-1953 और 1960-1963 में भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में उनका काफी योगदान माना जाता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री भी रहे। गुलजारीलाल नंदा दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहे। पहली बार पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन पर और दूसरी बार लाल बहादुर शास्त्री के निधन पर उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व सौंपा गया था। उनका पहला कार्यकाल 27 मई 1964 से 9 जून, 1964 तक रहा। दूसरा कार्यकाल 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक रहा। गांधीवादी विचारधारा के नंदा पहले 5 आम चुनावों में लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। सिद्धांतवादी गुलजारीलाल नंदा अपनी ही पार्टी की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के देश में इमरजेंसी लगाने के फैसले से नाराज हो गए थे। तब वो रेलमंत्री थे। उन्होंने आपातकाल के बाद चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। इंदिरा गांधी, राजा कर्ण सिंह समेत कई हस्तियां मनाने आईं, लेकिन वे फैसले पर अटल रहे। इसके बाद कभी चुनाव नहीं लड़ा। गुलजारीलाल नंदा ने कभी प्राइवेट काम में सरकारी गाड़ी प्रयोग नहीं की। वे कुरुक्षेत्र में नाभाहाउस के साधारण कमरों में ठहरते थे। परिवार गुजरात में ही था। सन् 1967 के बाद उनका अधिकांश समय कुरुक्षेत्र में गुजरा। वे गृहमंत्री थे तब एक बार दिल्ली निवास से उनकी बेटी डाॅ. पुष्पा यूनिवर्सिटी में फार्म भरने सरकारी गाड़ी में चली गईं। पता चलने पर नंदा खफा हुए। उन्होंने आठ मील गाड़ी आने-जाने का किराया बेटी की तरफ से खुद भरा। आज के दौर में तो ऐसी कल्पना करना भी बेहद मुश्किल है।
"....विपक्ष बीजेपी के खिलाफ अधिकांश एक उम्मीदवार उतारने की रणनीति बना रहा है। माना जा रहा है कि विपक्ष 475 लोकसभा सीटों पर बीजेपी के खिलाफ एक साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश में है। विपक्ष की मंशा साफ है कि वह अधिकांश सीटों पर एकजुट होकर भाजपा का सामना करें। हालांकि मौजूदा समय में ये ख़याली पुलाव ज्यादा है। दरअसल कांग्रेस के बिना ये संभव है नहीं और आम आदमी पार्टी जैसे दलों के साथ कांग्रेस के आने की सम्भावना कम है। जो दल राज्यों में एक दूसरे के खिलाफ तलवारें खींचे खड़े है वो केंद्र में भी एकसाथ आएं, ये व्यावहारिक नहीं लगता। छोटे दलों को ये भी डर है कि कांग्रेस के साथ आने से उनका वोट बैंक फिर कांग्रेस की तरफ खिसक सकता है, जो मोटे तौर पर उन्होंने कांग्रेस से ही छिटका है..." हर पार्टी के पास चुनाव लड़ने का समान अवसर होना लोकतंत्र की बुनियादी ज़रूरत है, लेकिन मौजूदा समय में साधन और कैडर के मामले में बीजेपी सभी दलों पर भारी दिखती है। इसी अंतर को पाटने की कोशिश में विपक्षी दल एक साथ आने लगे है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत से केंद्र की राजनीति में बीजेपी विरोधी दलों की हैसियत कम हुई है। तब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को अकेले करीब 45 प्रतिशत वोट मिले थे। तब से अब तक स्थिति में बड़ा बदलाव होता नहीं दिख रहा। ऐसे में जाहिर है विपक्ष भी जानता है कि एकजुट होकर ही भाजपा का सामना किया जा सकता है। आगामी लोकसभा चुनाव में महज़ 10 महीने का वक्त बचा है और भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए इसी विपक्ष के करीब 55 फीसदी वोट को एकजुट करने की बात हो रही है, जिसके लिए विपक्षी दलों की कोशिश जारी है। कर्नाटक के हालिया विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी एकता की कोशिशों को नया बल मिला है। इसका ताज़ा उदाहरण नए संसद भवन के उद्घाटन को छिड़े विवाद में दिखा है। इस मुद्दे पर पहली बार विपक्ष एकजुट नज़र आया और ये कवायद अब आगे भी बढ़ती दिख रही है। वहीं प्रशासनिक सेवाओं पर दिल्ली सरकार के अधिकार को नहीं मानने से जुड़े अध्यादेश के खिलाफ विपक्षी दलों को लामबंद करने में भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगे हैं। इन दोनों मुद्दों पर जिस तरह से विपक्षी दल ने नरेंद्र मोदी सरकार को घेरा, उससे सियासी गलियारे में इस पर बहस और तेज हो गई है कि क्या 2024 में चुनाव से पहले बीजेपी के खिलाफ मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है। जिस विपक्षी गठबंधन की संभावना है, उसमें ज्यादातर वहीं दल शामिल हो सकते हैं, जिन्होंने संसद के नए भवन के उदघाटन समारोह का सामूहिक रूप से बहिष्कार करने की घोषणा की थी। इनमें मुख्य तौर पर 19 दल हैं, जिनमें कांग्रेस के साथ ही तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, जेडीयू, आरजेडी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), सीपीएम और सीपीआई, राष्ट्रीय लोकदल और नेशनल कांफ्रेंस शामिल हैं। इनके अलावा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (मणि), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, विदुथलाई चिरुथिगल काट्ची, मारुमलार्ची द्रविड मुन्नेत्र कड़गम शामिल हैं। निर्विवाद तौर पर इनमें से एकमात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है, जिसका पैन इंडिया जनाधार है और बाकी विपक्षी दलों की पकड़ मौटे तौर पर राज्य विशेष तक ही सीमित है। कांग्रेस के अलावा टीएमसी पश्चिम बंगाल में, डीएमके तमिलनाडु में जेडीयू और आरजेडी बिहार में वहीं झामुमो झारखंड में प्रभावशाली है। समाजवादी पार्टी का प्रभाव उत्तर प्रदेश, एनसीपी और शिवसेना (ठाकरे गुट) का महाराष्ट्र, और नेशनल कांफ्रेंस का जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय लोकदल का सीमित प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। इनमें से आम आदमी पार्टी दो राज्यों पंजाब और दिल्ली में बेहद मजबूत स्थिति में है, वहीं गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे जनाधार बनाने की कवायद में है। सीपीएम का प्रभाव केरल में सबसे ज्यादा रह गया है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी उसके कैडर अभी भी मौजूद हैं। 19 दलों में से बाकी जो दल हैं उनका केरल और तमिलनाडु में छिटपुट प्रभाव है। क्या है विपक्ष का फॉर्मूला? गौरतलब है कि बीते एक माह में दो बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की है। कांग्रेस और सीएम नीतीश भी इस फार्मूला पर काम कर रहे हैं। अगले साल होने वाले चुनाव में विपक्ष साल 1974 का बिहार मॉडल लागू करना चाहता है। जिस तरह पूरा विपक्ष 1977 में कांग्रेस के खिलाफ हो गया था, वैसा ही कुछ अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में करने की कोशिश है। 1989 में राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ वीपी सिंह मॉडल को सभी विपक्षी दलों ने अपनाया था, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। इन दोनों चुनाव के दौरान विपक्ष ने एक सीट पर एक उम्मीदवार को उतारा था और सफलता हासिल हुई थी। हम इस बार के लोकसभा चुनाव में भी इसी रणनीति के तहत काम किया जा सकता है। विपक्ष की रणनीति : जिस सीट पर बीजेपी मजबूत स्थिति में दिखाई देगी, वहां पर सभी विपक्षी दल एक साथ मिलकर उसके (बीजेपी) खिलाफ उम्मीदवार उतारेंगे। अगर विपक्ष ऐसा करने में सफल रहे तो बीजेपी बेहद कम सीटों पर सिमट कर रह सकती है। इस रणनीति के तहत विपक्ष बिहार और महाराष्ट्र में मजबूत दिखाई दे रहा है। बिहार में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस एकजुट है तो वहीं महाराष्ट्र में उद्धव वाली शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस एकजुट है। इन दोनों राज्यों में बीजेपी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। बिहार और महाराष्ट्र में लोकसभा की क्रमश: 40 और 48 सीटें आती है। ऐसे में यदि विपक्ष यहां पर अपनी स्थिति मजबूत करता है तो इससे यूपी की भरपाई हो सकती है, क्योंकि यूपी में बीजेपी की स्थिति काफी ज्यादा मजबूत है। यहां लोकसभा की कुल 80 सीटें है। पश्चिम बंगाल में भी अगर ममता और कांग्रेस साथ आते है, तो कुछ लाभ स्वाभाविक है। क्या कहते हैं आंकड़े? 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को करीब 38 फ़ीसदी वोट के साथ 303 सीटें मिली थीं। वहीं दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही थी, जिसे क़रीब 20 फ़ीसदी वोट और महज़ 52 सीटें मिली थी। इसमें ममता बनर्जी की टीएमसी को 4 फीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे और उसने 22 सीटें जीती थी। जबकि एनसीपी को देश भर में क़रीब डेढ़ फीसदी वोट मिले थे और उसके 5 सांसद जीते थे। वहीं शिवसेना 18, जेडीयू 16 और समाजवादी पार्टी 5 सीटें जीत सकी थी। इन चुनावों में एनडीए को बिहार की 40 में से 39 सीटें मिली थी, लेकिन अब जेडीयू और बीजेपी के अलग होने के बाद राज्य में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदले नजर आते हैं। इसमें बीजेपी को 24 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उसकी प्रमुख सहयोगी जेडीयू को क़रीब 22 फ़ीसदी और एलजेपी को 8 फीसदी वोट मिले थे। इन चुनावों में एलजेपी से दोगुना वोट पाने के बाद भी आरजेडी को एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि कांग्रेस को क़रीब 8 फीसदी वोट मिलने के बाद महज़ एक ही सीट मिल पाई थी। इन्हीं आंकड़ों में विपक्षी एकता की ज़रूरत भी छिपी है और इसी में नीतीश कुमार को एक उम्मीद भी दिखती है। बिहार में एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक जनता दल के अधिकतम वोट एनडीए के पास आने पर ये 35 फीसदी के क़रीब दिखता है। जबकि राज्य में महागठबंधन के पास 45 फीसदी से ज़्यादा वोट हैं। 1. बीजेपी बनाम कांग्रेस (161 सीटें ) 12 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश जिसमें 161 लोकसभा सीटें शामिल हैं, यहाँ बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला देखने को मिला था। 147 सीटें ऐसी जहां दोनों के बीच सीधा मुकाबला था। वहीं 12 सीटों पर क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दल को चुनौती देते दिखे। 2 सीटों पर क्षेत्रीय दलों के बीच ही मुकाबला था। इसमें मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़, हरियाणा राज्य शामिल हैं। यहां बीजेपी को 147 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस को 9 और अन्य के खाते में 5 सीट गई। 2.बीजेपी बनाम क्षेत्रीय दल (198 सीटें) यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, और ओडिशा, इन 5 राज्यों की 198 सीटों पर अधिकांश में बीजेपी और रीजनल पार्टी के बीच ही मुकाबला रहा। 154 सीटों पर सीधा बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला था। 25 सीटों पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला था। 19 सीटों पर क्षेत्रीय दलों के बीच ही मुकाबला था। बंगाल की 42 सीटों में से 39 सीटों पर बीजेपी या तो पहले या दूसरे नंबर पर थी। पिछले चुनाव में बीजेपी को यहां 116 सीटों पर, कांग्रेस 6 और अन्य को 76 सीटों पर जीत मिली। 3.कांग्रेस बनाम क्षेत्रीय दल (25 सीटें ) 2019 के चुनाव में कांग्रेस केरल, लक्षद्वीप, नागालैंड, मेघालय और पुडुचेरी की 25 सीटों में से 20 पर पहले या दूसरे नंबर पर रही। यहां बीजेपी लड़ाई में भी नहीं दिखी। केरल की केवल एक सीट थी जहां बीजेपी को दूसरा स्थान हासिल हुआ था। यहां 17 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली। वहीं अन्य को 8 सीटें मिलीं। 4.यहां कोई भी मार सकता है बाजी (93 सीटें ) 6 राज्य ऐसे हैं जहां की 93 सीटों पर सबके बीच मुकाबला देखा गया। 93 सीटों पर बीजेपी, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल सभी मजबूत नजर आए। महाराष्ट्र इसका उदाहरण है जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों गठबंधन के साथ में हैं। यहां पिछले चुनाव में बीजेपी को 40, अन्य को 41 और कांग्रेस को 12 सीटों पर जीत हासिल हुई। 5.सिर्फ क्षेत्रीय पार्टी का ही दबदबा (66 सीटें ) तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम की 66 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां सिर्फ क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा है। तमिलनाडु की 39 सीटों में से सिर्फ 12 सीटों पर ही कांग्रेस या बीजेपी का थोड़ा आधार है, वह भी गठबंधन के सहारे। यहां 58 सीटों पर अन्य और 8 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली। बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था। कई विपक्षी दल एकजुटता से रहेंगे बाहर ऐसे तो विपक्ष में और भी दल हैं, जिनकी पकड़ राज्य विशेष में है। इनमें बीजेडी का ओडिशा में, बसपा का यूपी में, वाईएसआर कांग्रेस का आंध्र प्रदेश में, बीआरएस का तेलंगाना में अच्छा-खासा प्रभाव है। जेडीएस का कर्नाटक के कुछ सीटों पर प्रभाव है। हालांकि नवीन पटनायक, मायावती, जगन मोहन रेड्डी, के. चंद्रशेखर राव, और एच डी कुमारस्वामी का फिलहाल जो रवैया है, उसके मुताबिक इन दलों के कांग्रेस की अगुवाई में बनने वाले किसी भी गठबंधन में शामिल होने की संभावना बेहद क्षीण है। ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर जीत की संभावना के नजरिए से बीजेपी के लिए सबसे निर्णायक राज्यों में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, हरियाणा, उत्तराखंड, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और असम शामिल हैं।
कभी वीरभद्र सिंह के हनुमान कहे जाने वाले हर्ष महाजन को अब हिमाचल भाजपा ने कोर ग्रुप का सदस्य मनोनीत किया हैं। बीते साल हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हर्ष महाजन भाजपाई हो गए थे। तब माना जा रहा था कि शायद चम्बा सदर सीट से भाजपा महाजन पर दांव खेल सकती है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब बदली सियासी फ़िज़ा में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के आदेश पर हर्ष महाजन को भाजपा कोर ग्रुप का सदस्य बनाया गया हैं। ज़ाहिर है इस नियुक्ति के बाद भाजपा में हर्ष का सियासी कद बढ़ा है, साथ ही राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज़ हो चुकी है कि लोकसभा चुनाव में काँगड़ा संसदीय सीट से पार्टी हर्ष महाजन पर दांव खेल सकती है। हर्ष महाजन, स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के विशेष सलाहकार और रणनीतिकार रह चुके है। महाजन वीरभद्र सरकार में पशुपालन मंत्री भी रहे और फिर 2012 से 2017 तक कांग्रेस शासन में राज्य सहकारी बैंक के चेयरमैन भी। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने हर्ष महाजन को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का वर्किंग प्रेसिडेंट नियुक्त किया था। यानी कांग्रेस में रहते महाजन का सियासी कद लगातार बढ़ा ही है, लेकिन महाजन ने 2022 के चुनाव से ठीक पहले सबको चौंकाते हुए भाजपा का दामन थाम लिया था। महाजन के भाजपा में जाने से कयास लगाए जा रहे थे कि ये भाजपा का मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, दरअसल महाजन का चम्बा में बेहतर होल्ड माना जाता है, जाहिर है भाजपा को महाजन से कुछ उम्मीद तो ज़रूर रही होगी। हालांकि नतीजे आने के बाद महाजन की चम्बा सदर सीट पर भी कांग्रेस का परचम लहराया। भाजपा को अब भी महाजन की सियासी कुव्वत का अहसास है, इसलिए हर्ष महाजन को अहम् पद दिया गया है। भाजपा की सत्ता से विदाई होने के बाद हर्ष महाजन भी कमोबेश दरकिनार से ही दिखे है, पर अब उन्हें भाजपा कोर ग्रुप का सदस्य बनाया गया हैं। यानी अब भाजपा के अहम निर्णय लेने में उनकी भूमिका भी अहम होने वाली है। लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से भाजपा में कई बड़े बदलाव होने की चर्चा तेज़ है। प्रदेश में सत्ता गवाने के बाद भाजपा इस दफा कोई चूक नहीं करना चाहेगी। फिलवक्त प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है। काँगड़ा संसदीय सीट की बात करे तो यहाँ वर्तमान में किशन कपूर सांसद है, लेकिन विधानसभा चुनाव में इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन फीका रहा था। ऐसे में महाजन की नियुक्ति के बाद कयास लग रहे है कि क्या भाजपा इस दफा कांगड़ा संसदीय सीट पर चेहरा बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ सकती है ? महाजन जिला चम्बा से आते है और जिला चंबा के चार निर्वाचन क्षेत्र काँगड़ा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आते है। ऐसे में उनकी दावेदारी ख़ारिज नहीं की जा सकती। बहरहाल कयासों का सिलिसला जारी है।
देश में कई मौके ऐसे आएं है जब सरकारों ने अपने पक्ष में माहौल देखकर समय से पहले चुनाव करवा दिए। क्या आगामी लोकसभा चुनाव भी अपने तय वक्त से पहले हो सकते हैं, ये सवाल इन दिनों सियासी गलियारों में खूब गूंज रहा है। दरअसल, इसी साल के अंत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है। क्या मोदी सरकार इन्हीं के साथ लोकसभा चुनाव करवाने पर विचार कर रही है? क्या सरकार का नौ साल की उपलब्धियों के प्रचार में ताकत झोंकना इसका संकेत है? ये अहम सवाल है। 'सेवा सुशासन और गरीब कल्याण' के नारे के साथ भाजपा आक्रामक तरीके से मैदान में उतर चुकी है, मानो चुनाव की घोषणा हो चुकी हो। संभवतः सरकार और पार्टी के शीर्ष स्तर पर लोकसभा चुनावों को लेकर गंभीर मंथन हो रहा है। बीते 6 महीनो में हिमाचल प्रदेश और कर्णाटक में सत्ता से बेदखल हुई भाजपा निश्चित तौर पर आत्ममंथन जरूर कर रही होगी। हालांकि पूर्वोत्तर के नतीजों ने भाजपा को कुछ उत्साहित जरूर किया है। पर पार्टी को इस बात का भी इल्म है कि बीते कुछ समय में कांग्रेस पहले से ज्यादा नियोजित दिख रही है और एंटी इंकम्बैंसी को पूरी तरह खारिज करना भी गलत होगा। ये कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा कुछ असहज है। ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों को सोचने की जरुरत है। बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव इसी साल नवंबर-दिसंबर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ कराने का विचार हो रहा है। इसके पीछे एक तर्क ये हो सकता हैं कि विपक्ष अपनी तैयारी अगले साल मार्च-अप्रैल के हिसाब से कर रहा है और उसे समय नहीं मिलेगा। एक तर्क ये भी हैं कि अगर विधानसभा चुनावों में भाजपा को अनुकूल नतीजे नहीं मिले तो कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर नहीं होगा, बल्कि अगर दोनों चुनाव साथ हो जाते हैं, तो पीएम मोदी की लोकप्रियता का लाभ राज्यों के चुनावों में भी होगा। मुद्दे भांप रही हैं भाजपा ! कांग्रेस और भाजपा, दोनों तरफ सियासी पैंतरेबाजी तेज हो चुकी है। अगला लोकसभा चुनाव अमीर बनाम गरीब, हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय और बेतहाशा बढ़ी अमीरी के मुकाबले गरीबी रेखा के नीचे की आबादी में बढ़ोत्तरी जैसे मुद्दों के बीच देखने को मिल सकता हैं। जातीय जनगणना भी बड़ा मुद्दा बन सकती हैं। शायद भाजपा इसे समझ रही हैं और ऐसे में जल्द चुनाव से इंकार नहीं किया जा सकता। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का फीडबैक भी कारण ! मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से मिलने वाले फीड बैक भाजपा के लिए अच्छा नहीं बताया जा रहा है। राजस्थान में जरूर पार्टी अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट के झगड़े में लाभ तलश रही हैं लेकिन वसुंधरा राजे अगर नहीं साधी गई, तो मुश्किलें शायद भाजपा के लिए अधिक हो। उधर गहलोत सरकार की लोकलुभावन योजनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता। इसी तरह बिहार, प. बंगाल और महाराष्ट्र में पिछले लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को न दोहरा पाने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
हिमाचल प्रदेश सरकार पन बिजली के ज़रिए हिमाचल प्रदेश की आर्थिकी को बेहतर करने का हर संभव प्रयास कर रही है। सरकार के पास पानी से बिजली और इस बिजली से पैसा बनाने को लेकर कई योजनाएं है, जिनपर इन दिनों गहन मंथन जारी है। ये सभी चर्चाएं तब और भी तेज़ हुई जब सीएम सुखविंदर सुक्खू हाल ही में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह के साथ किन्नौर का दौरा करने पहुंचे। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के साथ सीएम सुक्खू की मुलाकात कई मायनो में अहम मानी जा रही है। दरअसल हिमाचल बिजली परियोजनाओं पर वाटर सेस लगाकर आमदनी बढ़ाना चाह रहा है। परन्तु हिमाचल के वाटर सैस को पंजाब और हरियाणा ने असंवैधानिक करार दिया है। हालांकि हिमाचल से पहले भाजपा शासित उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर भी वाटर सैस वसूल रहे है। इसके अलावा प्रदेश सरकार राज्य में स्थापित पावर प्रोजेक्ट में हिमाचल की हिस्सेदारी बढ़ाने तथा पावर प्रोजेक्टों में मिलने वाली 12 फीसदी रायल्टी को बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने की भी मांग है। उम्मीद जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री केंद्र से चर्चा कर इन समस्याओं का हल निकालेंगे और क़र्ज़ में डूबती प्रदेश की आर्थिकी को सहारा मिलेगा। इसी के साथ हिमाचल में शानन पावर प्रोजेक्ट को लेकर भी चर्चाएं तेज़ है। हिमाचल सरकार लीज खत्म होने के बाद शानन प्रोजेक्ट को अपने अधीन लेना चाहती है। लीज़ खत्म होने ही वाली है, मगर ठीक उससे पहले पंजाब को शानन प्रोजेक्ट की याद आ गई है। जोगिंद्रनगर स्थित शानन प्रोजेक्ट में विद्युत उत्पादन को लेकर इसके कायाकल्प के लिए पंजाब राज्य विद्युत बोर्ड ने 200 करोड़ का बजट जारी किया है। दिलचस्प बात ये है कि 2024 की लीज अवधि समाप्त होने से पहले परियोजना की 2026 की प्रस्तावित योजनाओं के लिए इस बजट को स्वीकृति मिली है। बता दें कि ब्रिटिश राज में मंडी के तत्कालीन राजा जोगिंदर सिंह ने शानन प्रोजेक्ट को 3 मार्च 1925 को 99 साल के लिए पंजाब को लीज पर दिया था। यह प्रोजेक्ट 110 मेगावाट हाईड्रो बिजली पैदा करता है, जो पंजाब को काफी सस्ती पड़ती है। हालाँकि पंजाब सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट के रखरखाव पर सवाल उठते रहे है। अब जब लीज अवधि समाप्त होने के नजदीक है तो पंजाब को इसकी याद आ गई। मिली जानकारी के अनुसार 110 मेगावाट की विद्युत परियोजना में विद्युत उत्पादन बढ़ाने के लिए यह बजट जारी हुआ है। मौजूदा समय में एक घंटे में 110 मेगावाट बिजली पैदा करने वाली इस पन विद्युत परियोजना में हर माह 2600 मेगावाट विद्युत उत्पादन से सालाना तीन से चार सौ करोड़ की आमदनी पंजाब सरकार को हो रही है। हालांकि हिमाचल प्रदेश सरकार पहले ही शानन पावर प्रोजेक्ट से पंजाब से वापस लेने का मन बना चुकी है। सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि लीज अवधि समाप्त होने के इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज 2 मार्च 2024 को समाप्त हो रही है और इसके बाद हिमाचल सरकार इसे संभालेगी।
एनसीपी के 25 वीन स्थापना दिवस दिवस पर जो हुआ वो पार्टी के इतिहास में दर्ज हो गया । कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करने को शरद पवार माइक पकड़ते है और चंद मिनटों में महाराष्ट्र की राजनीति में उफान आ जाता है। दरअसल शरद पवार पार्टी के दो कार्यकारी अध्यक्षों की घोषणा की गई - बेटी सुप्रिया सुले और छगन भुजबल। कोई जिम्मा देना तो दूर पुरे भाषण में एनसीपी के नंबर दो माने जाने वाले भतीजे अजित पवार का जिक्र तक नहीं करते। ये है शरद पवार और उनकी राजनीति का तरीका। पवार ने एक तीर से दो निशाने लगाने का काम किया है। शरद पवार ने अजित पवार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि एनसीपी में अब उनकी कोई ख़ास जगह नहीं बची है। दूसरा बेटी सुप्रिया सुले एनसीपी चीफ की अगली उत्तराधिकारी होगी, ये भी लगभग तय हो गया है। फिलहाल, अजित पवार के पास महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी है। एनसीपी में दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की खबर के बाद अजित पवार और उनके समर्थकों का क्या रुख रहता है, ये देखना दिलचस्प होगा। अजित अब एनसीपी में हाशिये पर है और आगे उनके पास अलग राह पकड़ना ही एक मात्र विकल्प दिख रहा है। अजित पवार खुद को कभी शरद पवार के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते थे। हालांकि, पिछले कुछ समय से दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं होने की खबरें आ रही थीं। बता दें कि अजित ने 2019 में भाजपा के साथ हाथ मिलाया था और देवेंद्र फडणवीस के साथ सुबह-सुबह शपथ ग्रहण समारोह में उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। पर चाचा शरद पवार के सियासी तिलिस्म के आगे अजित के अरमान दो दिन में ढह गए थे। अजित को वापस लौटकर चाचा की शरण में आना पड़ा था और इसके बाद एनसीपी -कांग्रेस और शिवसेना गठबंधन की सरकार बनी। शरद पवार के मन में कुछ चल रहा है इसके संकेत पिछले महीने ही मिल गए थे जब उन्होंने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। तब उनके अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद जो भूचाल आया था, वह उनके इस्तीफा वापस लेने के बाद ही थमा था। ये एक तरह से सन्देश था कि शरद पवार ही एनसीपी है। माहिर मानते है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि पार्टी में उनकी कुव्वत और पकड़ को लेकर किसी कोई शक ओ शुबा न रहे। दिलचस्प बात ये भी है कि शरद पवार के इस्तीफे के बाद अजित पवार ही एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने शरद पवार के इस्तीफे का समर्थन किया था और पार्टी के अन्य नेताओं को इसका सम्मान करने को कहा था। पर अजित के अरमान पुरे नहीं हुए और शरद पवार ने इस्तीफा वापस ले लिया। इसके बाद अजित पवार के भाजपा में शामिल होने की अटकलें लग रही थीं, हालांकि, अजित ने इन अटकलों को सिरे से खारिज करते रहे है। बहरहाल पिछले डेढ़ महीने में जिस तरह से एनसीपी में सब घटा है उससे ये तय है कि शरद पवार को सियासत का चाणक्य क्यों कहा जाता है।
हिमाचल प्रदेश में जुलाई माह ने से उपभोक्ताओं को डिपुओं में सस्ता खाद्य तेल उपलब्ध होगा। इस महीने तक डिपुओं में 147 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से सरसों तेल मिल रहा है, लेकिन जुलाई में 110 रुपए लीटर के हिसाब से तेल मिलेगा। इस हेतु खाद्य आपर्ति निगम ने सस्ता तेल मुहैया कराने के लिए तेल कंपनी को सप्लाई ऑर्डर दे दिया है। प्रदेश सरकार के इस निर्णय से प्रदेश के 19,74,790 राशन कार्ड धारकों को फायदा होगा। हिमाचल प्रदेश में ऐसा पहली बार होगा जब गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा से ऊपर उपभोक्ताओं को डिपुओं में एक ही दाम के हिसाब से सरसों तेल मिलेगा। वहीँ टैक्स पेयर राशन कार्ड धारकों को डिपुओं में 115 रुपए प्रति लीटर की दर से तेल मिलेगा। गौरतलब है कि बीते सप्ताह मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने रोहड़ू के चिड़गांव दौरे के दौरान सरसों तेल की कीमत 37 रुपए कम करने की घोषणा की थी।
खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए 363 बिश्नोइयों ने कटवा दिए थे अपने सिर खेजड़ी बिश्नोई समाज का धार्मिक पेड़ है। हर बिश्नोई के घर के बाहर यह पेड़ देखने को मिलता है। इसके पीछे की कहानी बेहद रोचक हैI दरअसल करीब 300 साल पहले राजा अभय सिंह ने अपने महल के दरवाजे बनवाने के लिए हरे पेड़ों की लकड़ी कटवाने का आदेश दिया था। राजा को ज्ञात हुआ कि बिश्नोई बहुल इलाके में सबसे ज्यादा हरे पेड़ मिलेंगे। आदेशानुसार सेना वहां पेड़ काटने के लिए पहुंच गईI सेना को बिश्नोई समाज का विरोध झेला पड़ाI तब समाज की महिला ‘माता अमृता देवी’ ने इसका विरोध किया और संघर्ष करते हुए अपना शीश कटा दिया। शीश कटवाने से पहले माता अमृता देवी ने उनसे कहा, ‘सिर सांटे रूख रहे, तो भी सस्तो जाणिये।’ मतलब - अगर सिर कटवा देने से एक पेड़ भी बच जाता है तो यह मेरे लिए सस्ता सौदा है। उस वक्त 363 बिश्नोइयों ने भी अपना सिर कटवा दिया था। इसके बाद से खेजड़ी के पेड़ की पूजा शुरू हो गई।
हिमाचल सरकार, पूर्व जयराम सरकार के फाइनेंशियल मिस्मैनेजमेंट को लेकर श्वेत पत्र लाएगी। इसके लिए गठित कैबिनेट सब कमेटी का आज प्रदेश सचिवालय में पहली बैठक है। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में गठित सब कमेटी बताएंगी कि हिमाचल के आर्थिक हालात क्यों बिगड़े है। बता दें कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दौरान भी ये वादा किया था कि राज्य के वित्तीय हालात पर श्वेत पत्र जारी किया जाएगा। कैबिनेट सब कमेटी आंकलन करेगी कि जयराम सरकार के कार्यकाल में कितना कर्ज लिया गया है। लिया गया कर्जा कहां खर्च हुआ और कितनी फिजूलखर्ची हुई। कर्ज लेने के कारण और उसके इस्तेमाल को लेकर भी सब कमेटी रिपोर्ट तय करेगी। कैबिनेट सब कमेटी में डिप्टी CM मुकेश अग्निहोत्री चेयरमैन है, जबकि कृषि मंत्री चंद्र कुमार और ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह को सदस्य बनाया गया है। जबकि वित्त सचिव को इस कैबिनेट सब-कमेटी का सदस्य सचिव नियुक्त किया है। 75 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज : हिमाचल प्रदेश पर 75 हजार करोड़ से अधिक का कर्ज है। कर्मचारियों की 10 हजार करोड़ से भी ज्यादा की देनदारी बकाया है। वहीँ वर्तमान में सरकार आर्थिक बदहाली का सामना कर रही है। सीएम सुक्खू शुरू से खराब आर्थिकी पर खुलकर बोलते रहे है और अब सरकार श्वेत पत्र लेकर आ रही है ।
मुंबई में श्रद्धा वालकर मर्डर केस जैसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। दरअसल मुंबई के मीरा रोड इलाके की आकाशगंगा सोसाइटी में एक महिला की निर्मम हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं हत्यारे ने सबूत मिटाने के लिए शव के टुकड़ों को कुकर में उबाल भी दिया। पुलिस को शक है कि उसने उबला हुआ मांस कुत्तों को खिलाया। आरोपी का नाम मनोज साने है। वह पिछले 3 साल से सरस्वती वैद्य नाम की महिला के साथ मीरा रोड इलाके की आकाशगंगा बिल्डिंग के 7वें फ्लोर पर किराए के फ्लैट में रह रहा था। फ्लैट से बदबू आने पर बिल्डिंग के लोगों ने बुधवार को पुलिस को सूचना दी थी, जिसके बाद पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची और सोसाइटी की सातवीं मंजिला से महिला का क्षत-विक्षत शव बरामद किया। पुलिस ने लिव-इन पार्टनर की हत्या और उसके शव के कई टुकड़े करने के आरोप में मृतका के दोस्त को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। पुलिस के अनुसार प्रारंभिक जांच में महिला की बेरहमी से हत्या किए जाने की बात सामने आई है।
क्या आरबीआई 500 के नोट भी बंद करने वाला है, क्या 1000 रूपए के नोट वापस आएँगे ? 2000 के नोट वापस लेने की घोषणा के बाद आपने भी ये बातें ज़रूर सुनी होंगी। आपको बता दें की ऐसा बिलकुल भी नहीं हो रहा। आरबीआई 500 रुपये के नोटों को वापस लेने या 1,000 रुपये के नोटों को फिर से पेश करने के बारे में नहीं सोच रहा है। आरबीआई गवर्नर ने जनता से ऐसी अटकलें न लगाने का अनुरोध किया है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने एमपीसी की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान ये बात कही। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि 2000 नोटों को चलन से बाहर करने के फैसले के बाद लगभग 50% दो हजार के नोट बैंकों में वापस आ गए हैं। कुल 3.62 लाख करोड़ के 2000 के नोट 31 मार्च 2023 तक चलन में थे, उनमें से 1.80 लाख करोड़ के नोट बैंकों में वापस आ गए हैं। आने वाले समय में 85% 2000 के नोट बैंकिंग सिस्टम में जमा के जरिए, जबकि बाकी नोट एक्सचेंज के जरिए वापस आने की सम्भावना हैं।
मुंबई में श्रद्धा वालकर मर्डर केस जैसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। दरअसल मुंबई के मीरा रोड इलाके की आकाशगंगा सोसाइटी में एक महिला की निर्मम हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं हत्यारे ने सबूत मिटाने के लिए शव के टुकड़ों को कुकर में उबाल भी दिया। पुलिस को शक है कि उसने उबला हुआ मांस कुत्तों को खिलाया। आरोपी का नाम मनोज साने है। वह पिछले 3 साल से सरस्वती वैद्य नाम की महिला के साथ मीरा रोड इलाके की आकाशगंगा बिल्डिंग के 7वें फ्लोर पर किराए के फ्लैट में रह रहा था। फ्लैट से बदबू आने पर बिल्डिंग के लोगों ने बुधवार को पुलिस को सूचना दी थी, जिसके बाद पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची और सोसाइटी की सातवीं मंजिला से महिला का क्षत-विक्षत शव बरामद किया। पुलिस ने लिव-इन पार्टनर की हत्या और उसके शव के कई टुकड़े करने के आरोप में मृतका के दोस्त को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। पुलिस के अनुसार प्रारंभिक जांच में महिला की बेरहमी से हत्या किए जाने की बात सामने आई है।
हिमाचल के सीएम सुखविंदर सुक्खू और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह आज किन्नौर के दौरे पर रहेंगे। दोनों नेता चीन सीमा से सटे वाइब्रेंट विलेज छितकुल में विभिन्न निर्माण गतिविधियों का जायजा लेंगे। विदित रहे कि मोदी सरकार ने छितकुल गांव को वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत टूरिज्म और इन्फ्रॉस्ट्रक्चर बनाने के लिए चिन्हित कर रखा है और इसके तहत छितकुल में भी विभिन्न गतिविधियां चल रही है। केंद्र के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम का मकसद भारत-चीन सीमा पर बसे गांवों का समग्र विकास करना है। इसके लिए 4,800 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत है। साथ ही इन क्षेत्रों में सड़कों के नेटवर्क को मजबूत करने के लिए 2,500 करोड़ का अलग बजट हैं। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के साथ सीएम सुक्खू की मुलाकात कई मायनो में अहम मानी जा रही है। दोनों नेताओं के बीच आज वाटर सैस के मसले पर भी चर्चा संभावित है। दरअसल केंद्र ने हिमाचल के वाटर सैस को असंवैधानिक करार दिया है। हालांकि हिमाचल से पहले भाजपा शासित उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर भी वाटर सैस वसूल रहे है। इसके अलावा प्रदेश सरकार राज्य में स्थापित पावर प्रोजेक्ट में हिमाचल की हिस्सेदारी बढ़ाने तथा पावर प्रोजेक्टों में मिलने वाली 12 फीसदी रायल्टी को बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने की भी मनाग कर रही है। संभावित है मुख्यमंत्री इस दौरान केंद्रीय ऊर्जा मंत्री से साल 2024 में खत्म हो रही शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज पर भी चर्चा करेंगे। हिमाचल सरकार लीज खत्म होने के बाद शानन प्रोजेक्ट को अपने अधीन लेना चाहती है। हिमाचल के इन 4 मुद्दों पर चर्चा संभव : वाटर सैस के मसले पर भी चर्चा संभावित पावर प्रोजेक्ट में हिमाचल की हिस्सेदारी बढ़ाने पर हो सकती है चर्चा पावर प्रोजेक्टों में रायल्टी को बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने की मांग शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज पर भी चर्चा संभव
आखिर पंजाब को शानन प्रोजेक्ट की याद आ गई है। जोगिंद्रनगर स्थित शानन प्रोजेक्ट में विद्युत उत्पादन को लेकर इसके कायाकल्प के लिए पंजाब राज्य विद्युत बोर्ड ने 200 करोड़ का बजट जारी किया है। दिलचस्प बात ये है कि 2024 की लीज अवधि समाप्त होने से पहले परियोजना की 2026 की प्रस्तावित योजनाओं के लिए इस बजट को स्वीकृति मिली है। बता दें कि ब्रिटिश राज में मंडी के तत्कालीन राजा जोगिंदर सिंह ने शानन प्रोजेक्ट को 3 मार्च 1925 को 99 साल के लिए पंजाब को लीज पर दिया था। यह प्रोजेक्ट पावरकाम के अधीन 110 मेगावाट हाईड्रो बिजली पैदा करता है, जो पंजाब को काफी सस्ती पड़ती है। हालाँकि पंजाब सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट के रखरखाव पर सवाल उठते रहे है। अब जब लीज अवधि समाप्त होने के नजदीक है तो पंजाब को इसकी याद आ गई। मिली जानकारी के अनुसार 110 मेगावाट की विद्युत परियोजना में विद्युत उत्पादन बढ़ाने के लिए यह बजट जारी हुआ है। मौजूदा समय में एक घंटे में 110 मेगावाट बिजली पैदा करने वाली इस पन विद्युत परियोजना में हर माह 2600 मेगावाट विद्युत उत्पादन से सालाना तीन से चार सौ करोड़ की आमदनी पंजाब सरकार को हो रही है। हालांकि हिमाचल प्रदेश सरकार पहले ही शानन पावर प्रोजेक्ट से पंजाब से वापस लेने का मन बना चुकी है। सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि लीज अवधि समाप्त होने के इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज 2 मार्च 2024 को समाप्त हो रही है और इसके बाद हिमाचल सरकार इसे संभालेगी।
दुनिया का सबसे बड़ा संविधान यानी हिन्दुस्तान का संविधान लिखने वाले डॉ भीमराव अम्बेडकर नहीं थे, बल्कि बल्कि प्रेम बिहारी नारायण रायजादा हैं। दरअसल, डॉ. अंबेडकर संविधान सभा की ड्राफ्टिंग सभा के अध्यक्ष थे और इसलिए उन्हें संविधान निर्माता होने का श्रेय दिया जाता है। मगर प्रेम बिहारी वे शख्स हैं जिन्होंने अपने हाथ से अंग्रेजी में संविधान की मूल कॉपी यानी पांडुलिपि लिखी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद प्रेम बिहारी से यह काम करने की गुजारिश की थी। प्रेम बिहारी ने इसके बदले फीस नहीं ली थी। बस पंडित नेहरू से ये ही कहा - " एक पैसा भी नहीं। मेरे पास भगवान की दया से सब कुछ है और मैं अपनी जिंदगी में खुश हूं, पर मेरी एक शर्त है कि इसके हर एक पन्ने पर मैं अपना नाम और आखिरी पन्ने पर अपना और दादाजी का नाम लिखूंगा।" भारत का संविधान न केवल हाथ से लिखा गया है, बल्कि शांति निकेतन के चित्रकारों ने इसके कवर से लेकर हर पन्ने को भी अपनी सुंदर कला से सजाया हैं। भारतीय संविधान की अंग्रेजी में लिखी पांडुलिपि और उसका हिंदी अनुवाद संसद की लाइब्रेरी में दो विशेष बक्सों में रखे हुए हैं। कांच से बने इन पारदर्शी मगर सीलबंद बक्सों में नाइट्रोजन भरी है, जो पांडुलिपि के कागज को खराब नहीं होने देती। ये दोनों बॉक्स अमेरिका की एक कंपनी ने कैलिफोर्निया में बनाए थे। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है। इसमें एक प्रस्तावना, 448 आर्टिकल्स के साथ 22 पार्ट्स, 12 अनुसूचियां और 5 एपेंडिक्स और कुल 1.46 लाख शब्द शामिल हैं। इसे तैयार करने से पहले दुनिया के 60 देशों के संविधान को पढ़ा गया। भारत का पूरा संविधान हाथ से लिखा गया है। इसे लिखने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा था। डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है। संविधान को लिखने का काम कैलिग्राफिस्ट प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने किया था। प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने संविधान लेखन के लिए एक भी पैसा नहीं लिया था। भारत के संविधान की एक मूल प्रति ग्वालियर की सेंट्रल लाइब्रेरी में रखी हुई है। इस प्रति में पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित संविधान सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। भारत के संविधान को बैग ऑफ बॉरोविंग्स भी कहा जाता है क्योंकि इसे बनाने के लिए 10 प्रमुख देशों के अलावा उस समय मौजूद 60 से अधिक संविधानों की सहायता ली गई। संविधान को लिखने का काम 26 नवंबर 1949 को पूरा हो गया था, लेकिन इसे 26 जनवरी 1950 में देश में लागू किया गया। आजादी से पहले 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव लागू हुआ था। इस तिथि को महत्व देने के लिए 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू किया गया। इस दिन को गणतंत्र दिवस घोषित किया गया।
भारतीय कुश्ती महासंघ के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे पहलवानों और खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के बीच तकरीबन 5 घंटे तक बैठक चली। पहलवानों के आंदोलन खत्म कराने को लेकर सरकार ने समाधान स्वरूप बातचीत के लिए खिलाड़ियों को बुलाया था। पहलवान बीजेपी सासंद और डब्ल्यूएफआई के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं। बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। उनके खिलाफ दिल्ली पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की है। इस बीच सरकार निष्पक्ष जांच कराने को कह रही है। खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई वो हैं- 15 जून तक पुलिस चार्जशीट दायर करे। रेसलिंग फेडरेशन का चुनाव 30 जून तक संपन्न करवाए जाएं। जब तक रेसलिंग फेडरेशन का चुनाव नहीं होता तब तक आयोग की कमेटी से दो लोगों का नाम प्रस्तावित किया गया है। महिला खिलाड़ियों को सिक्योरिटी देने पर चर्चा की गई। पहलवानों ने कहा है कि वे 15 जून तक कोई प्रदर्शन या आंदोलन नहीं करेंगे। इस बैठक के बाद बजरंग पुनिया और साक्षी मलिक ने कहा.... सरकार सहमत हैं कि खिलाड़ियों के ऊपर जितने केस हुए हैं वो सब हटाए जायेंगे। कुछ मांगों को सरकार की ओर से माना गया है। अभी और भी मांगे हैं जिसपर हमारा सरकार से मतभेद है। पुलिस की जांच 15 जून तक पूरी हो जानी चाहिए और मंत्री ने हमसे तब तक विरोध प्रदर्शन नहीं करने का अनुरोध किया है। आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। खाप चौधरियों के सामने सरकार से जो बातचीत हुई है, उसके बारे में जानकारी देंगे।
राजीव और सोनिया गाँधी की प्रेम कहानी एक खूबसूरत कल्पना की तरह शुरू हुई और एक दुखद मोड़ पर इसका अंत हुआ। राजीव जब इंग्लैंड में थे तो इटली की रहने वाली युवती, सोनिया मैनो को पहली नज़र में दिल दे बैठे। 1965 में 21 साल की उम्र में राजीव गांधी पढ़ाई के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज पहुंचे। उसी साल कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के लेनॉक्स कुक स्कूल में अंग्रेजी भाषा सीखने इटली से एंटोनिया अलबिना मायनो आई थी, जो अब सोनिया गाँधी है। सोनिया और राजीव के कैंपस अलग थे लेकि कहते है सोनिया उबला खाना खाकर ऊब गई थीं, इसलिए वह यूनिवर्सिटी के रेस्टोरेंट में खाना खाती थीं। उसी रेस्टोरेंट में एक सोनिया अपनी सहेली के साथ बैठी थीं, तभी उनका एक दोस्त राजीव गांधी के साथ रेस्टोरेंट के अंदर पहुंचा। उसने सोनिया से कहा, "आज मैं आपको अपने दोस्त से मिलवाना चाहता हूं, ये भारत से आए हैं और इनका नाम राजीव है।" राजीव ने हाथ आगे हाथ बढ़ाया और सोनिया ने शर्माते हुए मिला लिया। दोनों के बीच कोई बात नहीं ही लेकिन एक खूबसूरत प्रेम कहानी शुरू हो चुकी थी। सोनिया गांधी की जीवनी 'द रेड साड़ी' में जेवियर मोरो लिखते हैं, "राजीव ने उसी दिन तय कर लिया था कि सोनिया ही आगे उनकी जीवन साथी बनेंगी। " मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो चूका था और दोनों को जैसे ही फुर्सत मिलती, वह घूमने निकल जाते थे। सोनिया गांधी राजीव को पसंद तो करने लगी थी, लेकिन उन्हें भारत के नाम पर, यहां के रीति-रिवाज को लेकर डर लग रहा था। इस बीच सोनिया ने तय कर लिया कि अब कभी नहीं मिलना पर सोनिया न चाहते हुए भी राजीव से मिलने लगी और दोनों के बीच प्यार हो गया। एक दिन राजीव पैदल ही सोनिया को घर छोड़ने निकल पड़े, दरसल उस दिन सोनिया अपनी साइकिल नहीं लाइ थी। दोनों साथ पैदल निकले और राजीव ने इसी सफर में सोनिया को प्रपोज कर दिया। सोनिया ने प्रपोजल को मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लिया। दोनों एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में चुन चुके थे व जल्द ही अपने परिवारों को भी इसके बारे में बता दिया। कहते है कि मां इंदिरा चाहती थी कि राजीव की शादी बॉलीवुड के शोमैन राज कपूर की बेटी से हो। पर राजीव तो अपना दिल सोनिया को दे बैठे थे। राजीव के कहने पर इंदिरा, सोनिया से मिली व दोनों के फैसले का खुले मन से स्वागत किया। दोनों की शादी 1968 में हुई। राजीव से हुई इस पहली मुलाक़ात के बारे में सोनिया ने उनकी मृत्यु के बाद लिखे एक पत्र में कहा था " मैं भूल जाना चाहती हूँ उनका आखिरी चेहरा, और रेस्टोरेंट में हुई वो पहली मुलाक़ात, वो मुस्कान याद रखना चाहती हूँ।"
बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में की गई। इस बैठक में किसान, गुरुग्राम सिटी सेंटर मेट्रो सहित कई कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। बैठक में एक बड़ा फैसला बीएसएनएल (BSNL) को लेकर लिया गया है। कैबिनेट ने बीएसएनएल के लिए 89,000 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दे दी है। इस रकम का इस्तेमाल BSNL की 4G और 5G सर्विसेज को बढ़ाने के लिए किया जाएगा। BSNL को तीसरा रिवाइवल पैकेज कैबिनेट बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि मोदी कैबिनेट ने बीएसएनएल के लिए तीसरे रिवाइवल पैकेज को मंजूरी दी है। गौरतलब है कि BSNL के लिए यह केंद्र द्वारा घोषित पहला रिवाइवल पैकेज नहीं है इससे पहले सरकार ने पिछले साल जुलाई 2022 में भी टेलीकॉम पीएसयू को अधिक लाभदायक संगठन में तब्दील करने के उद्देश्य से 4जी और 5जी सेवाएं प्रदान करने के लिए एक पैकेज की घोषणा की थी। जो बीएसएनएल की सेवाओं को बढ़ावा देना और गुणवत्ता में सुधार के साथ ही बीएसएनएल के ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के विस्तार पर केंद्रित था। MSP में बंपर इजाफा पीयूष गोयल ने बताया कि 2023-24 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को 143 रुपये बढ़ाकर 2,183 रुपये प्रति क्विंटल करने की मंजूरी दी गई। वहीं मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य सबसे अधिक बढ़ाकर 8,558 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। मूंग दाल के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सबसे ज्यादा 10.4 फीसदी, मूंगफली पर 9%, सेसमम पर 10.3%, धान पर 7%, जवार, बाजरा, रागी, मेज, अरहर दाल, उड़द दाल, सोयाबीन और सूरजमुखी बीज पर वित्त वर्ष 2023-2024 के लिए लगभग 6 से 7 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।
उज्जैन के महाकाल लोक में मूर्तियां गिरने से जुड़े एक वीडियो ने साधु-संतों को नाराज कर दिया है। दरअसल इस वीडियो में भगवान शिव और नारद मुनि के कैरेक्टर के बीच महाकाल लोक में मूर्तियां गिरने के मामले में बातचीत दिखाई गई है। 46 सेकेंड के इस वीडियो के अंत में भगवान् शिव यह कहते दिख रहे हैं कि अब कमलनाथ को ही लाना ही होगा। इस पर संत समाज ने कहा है कि कांग्रेस को धर्म का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।वहीँ बीजेपी भी इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर हमलावर हो गई है। बता दें की बीते दिनों महाकाल लोक में तूफ़ान के बाद सप्त ऋषियों की मूर्तियां गिर गई थी। इसको लेकर कांग्रेस हमलावर है और भ्रष्टाचार को लेकर मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार को घेर रह है।
केंद्र सरकार कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे पहलवानों से फिर बातचीत करने के लिए तैयार है। केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने ट्वीट कर ये जानकारी दी। अपने ट्वीट में अनुराग ठाकुर ने कहा, 'सरकार पहलवानों से उनके मुद्दों पर बातचीत करने की इच्छुक है। मैंने उन्हें एक बार फिर बातचीत के लिए बुलाया है।' बता दें कि इससे पहले पहलवानों ने 4 जून की रात को गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इसके बाद 5 जून को विनेश, साक्षी और बजरंग ने रेलवे में ड्यूटी जॉइन कर ली। हालांकि पहलवानों ने ये भी कहा कि उनका आंदोलन जारी रहेगा। वहीँ, दिल्ली पुलिस मंगलवार को बृजभूषण सिंह के लखनऊ और गोंडा स्थित घरों पर पहुंची थी और बृजभूषण के कई कर्मचारियों से पूछताछ की गई।
**शिमला में निवेशकों से चर्चा करेंगे सीएम सुक्खू प्रदेश में जयराम सरकार के समय इन्वेस्टर मीट में करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के एमओयू साइन हुए थे, लेकिन मौजूदा उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान का कहना है कि इनमें से धरातल पर सिर्फ 27 हजार करोड़ का निवेश उतरा है। यानी अधिकांश निवेशकों ने रूचि तो दिखाई लेकिन निवेश नहीं किया। अब राज्य के ख़राब आर्थिक हालात के बीच मौजूदा सरकार ने इन निवेशकों को साधने की पहल की है। खुद सीएम सुक्खू निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से पहले से लटके 1000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्टों पर दो दिन शिमला में निवेशकों से चर्चा करेंगे। इस दौरान ऊर्जा विभाग के 20, पर्यटन के 14 तथा उद्योग विभाग के 46 प्रस्तावों पर निवेशकों के साथ चर्चा होगी। उम्मीद है मुख्यमंत्री सुक्खू की ये पहल रंग लाएगी। पीटरहॉफ में 2 दिन चलने वाली इस मीट में मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू खुद मौजूद रहेंगे और उद्योगपतियों की परेशानियों को सुनेंगे। इन्वेस्टर मीट में उन औद्योगिक घरानों को बुलाया गया है, जिन्होंने पूर्व में राज्य सरकार के साथ निवेश के लिए एग्रीमेंट कर रखा है, लेकिन प्रोजेक्ट अब तक सिरे नहीं चढ़ पाए। उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि एक हजार करोड़ से अधिक के 80 प्रोजेक्ट संचालकों को इन्वेस्टर मीट में बुलाया गया है। इन प्रोजेक्ट की कुल लागत 31 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की है। प्रोजेक्ट लगाने में जो बाधा आ रही है, उन बाधाओं को निपटाने का प्रयास किया जाएगा। जयराम सरकार में अधिकांश प्रोजेक्ट नहीं चढ़े सिरे : हर्षवर्धन उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि पूर्व भाजपा सरकार ने भी इन्वेस्टर मीट में 1 लाख 25 हजार करोड़ के MOU साइन किए है, लेकिन धरातल पर 27 हजार करोड़ प्रोजेक्ट उतर पाए है। कांग्रेस सरकार पॉलिसी को रिव्यू कर रही है और उद्योगपतियों को सभी सुविधाएं एक छत्त के नीचे देने का प्रयास किया जा रहा है।
75 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज के बोझ तले दबा हिमाचल प्रदेश आज फिर 800 करोड़ का कर्ज लेगा। राज्य सरकार एक हजार करोड़ रुपये के ओवर ड्राफ्ट में है और इसी के चलते सरकार बुधवार को 800 करोड़ रुपये का ऋण लेगी। मंगलवार को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में राज्य की गंभीर वित्तीय स्थिति पर चिंता जताई गई है। विदित रहे कि केंद्र सरकार ने राज्य के कर्ज लेने की सीमा पर करीब पांच हजार करोड़ रुपये सालाना की कटौती कर दी है। साथ ही बाह्य सहायता प्राप्त प्रोजेक्टों के लिए आर्थिक मदद लेने की सीमा भी तय कर दी है। अब सरकार एक साल में तीन हजार करोड़ से अधिक के प्रोजेक्टों के लिए बाह्य सहायता प्राप्त नहीं कर सकेगी। वहीँ करीब 8500 करोड़ रुपये के बाह्य सहायता प्राप्त प्रोजेक्ट केंद्र के पास लंबित हैं। ऐसे में हिमाचल आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। निवेशकों से चर्चा करेंगे सीएम सुक्खू : प्रदेश में जयराम सरकार के समय इन्वेस्टर मीट में करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के एमओयू साइन हुए थे, लेकिन मौजूदा उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान का कहना है कि इनमे से धरातल पर सिर्फ 27 हजार करोड़ का निवेश उतरा है। अब सीएम सुक्खू निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से पहले से लटके 1000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्टों पर दो दिन शिमला में निवेशकों से चर्चा करेंगे। इस दौरान ऊर्जा विभाग के 20, पर्यटन के 14 तथा उद्योग विभाग के 46 प्रस्तावों पर निवेशकों के साथ चर्चा होगी। वाटर सेस के लिए बनाई कमेटी : मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में मंगलवार को राज्य सचिवालय में हुई कैबिनेट बैठक हुई में पंजाब, हरियाणा के विरोध के बाद वाटर सेस पर चर्चा के लिए कैबिनेट ने सचिव ऊर्जा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है।
झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन ने झारखंड इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग ऑफिसर कांपटीटिव एग्जामिनेशन 2023 के लिए योग्य उम्ममीदवारों से आवेदन मांगे हैं। कैंडिडेट्स जो इन भर्तियों के लिए अप्लाई करना चाहते हों, वे आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर फॉर्म भर सकते हैं। इस रिक्रूटमेंट ड्राइव के माध्यम से इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग ऑफिसर के कुल 904 पद भरे जाएंगे। बता दे इन पदों के लिए केवल ऑनलाइन आवेदन कर सकते है। इसके लिए जेएसएससी की ऑफिशियल वेबसाइट jssc.nic.injssc.nic. पर आवेदन किया जा सकता है। अप्लाई करने की लास्ट डेट इन पद पर अप्लाई करने के लिए कैंडिडेट किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से आईटीआई/एनसीटी/डिग्री/डिप्लोमा (इंजीनियरिंग) में होना अनिवार्य है या इसके समकक्ष योग्यता रखने वाले उम्मीदवार भी आवेदन कर सकते हैं। इन पद के लिए एज लिमिट 21 से 35 साल तय की गई है। आरक्षित श्रेणी को ऊपरी आयु सीमा में छूट मिलेगी। इन वैकेंसी के लिए अभी केवल नोटिस जारी हुआ है। इसके लिए 23 जून 2023 से रजिस्ट्रेशन शुरू होंगे और फॉर्म भरने की लास्ट डेट 22 जुलाई 2023 है। आवेदन शुल्क 100 रुपये है। आरक्षित श्रेणी को शुल्क के रूप में 50 रुपये देने हैं।
बालासोर में दर्दनाक ट्रेन हादसे को 36 घंटे से ज्यादा का समय बीत चूका है। ओडिशा के अस्पतालों में अब भी सन्नाटा पसरा हुआ है। वहीं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव हादसे के बाद से ही घटनास्थल पर डटे हुए हैं। रेल हादसे में अब रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि घटना के असल कारणों का पता चल गया है। अश्विनी वैष्णव ने बताया कि ये हादसा इंटरलॉकिंग में बदलाव के चलते हुआ है। घटना में जिम्मेदार लोगों की पहचान भी कर ली गई है और जांच रिपोर्ट जल्द सामने आ जाएगी। उन्होंने कहा कि कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए गए निर्देशों पर तेजी से काम चल रहा है। कल रात को एक ट्रैक का काम लगभग पूरा हो चूका है। आज एक ट्रैक की पूरी मरम्मत करने की कोशिश रहेगी। सभी डिब्बों को हटा दिया गया है साथ ही शवों को निकाल लिया गया है। कार्य तेजी से चल रहा है और पूरी कोशिश है कि बुधवार की सुबह तक सामान्य रूट चालू हो जाए।
हिमाचल प्रदेश चिकित्सक संघ संयुक्त संघर्ष समिति ने पेन डाउन हड़ताल की अवधि को आधा करने का निर्णय लिया है। नॉन प्रेक्टिस अलाउंस विथड्रॉ करने के विरोध में सोमवार से शुरू हुई डेढ़ घंटे की पेन डाउन हड़ताल की अवधि को हिमाचल प्रदेश चिकित्सक संघ संयुक्त संघर्ष समिति ने अब आधा करने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री के आह्वान और कैबिनेट मंत्री हर्षवर्धन चौहान के साथ 30 मई की शाम को हुई वार्ता के बाद डॉक्टरों ने ये कदम उठाया है। दरअसल मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने संघर्ष समिति को आश्वासन दिया है कि उनकी वार्ता 3 जून को मुख्यमंत्री से होगी। डॉक्टरों की संयुक्त संघर्ष समिति की तीन अहम् मांगे है। * सरकार एनपीए को लेकर हाल ही में निकाली गई अधिसूचनाओं को तत्काल वापस ले या संशोधन करें। * चिकित्सकों के टाइम स्केल 4-9-14 को जारी रखा जाना चाहिए। * डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन स्कीम के तहत राजकीय मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी एवं सीनियर रेसिडेंट्स / ट्यूटर स्पेशलिस्ट के पदों को निरंतर प्रक्रिया के तहत भरा जाए। सहायक प्रोफेसर के पद पर ही सीधी भर्ती हो। उसके बाद केवल पदोन्नति सह प्राध्यापक एवं प्राध्यापक के पद भरे जाएं। संघ ने मांग है कि सहायक प्राध्यापक से प्राध्यापक की पदोन्नति डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन स्कीम के तहत की जाए।
एअर इंडिया की फ्लाइट में क्रू मेंबर के साथ बदतमीजी करने की घटना सामने आई है। मिली जानकारी के मुताबिक फ्लाइट AI882 में 29 मई को एक यात्री ने बदतमीजी की। आरोपी यात्री ने चालक दल के सदस्यों को गालियां दी और फिर उनमें से एक पर हमला भी किया। दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरने के बाद भी यात्री को सुरक्षाकर्मियों को सौंप दिया गया। बता दें कि एअर इंडिया की फ्लाइट में दो महीने में इस तरह की यह दूसरी घटना है। इससे पहले अप्रैल के महीने में एक यात्री ने भी क्रू मेंबर के साथ दुर्व्यवहार किया था। 10 अप्रैल को दिल्ली-लंदन की फ्लाइट में एक यात्री ने दो महिला केबिन क्रू सदस्यों के साथ बदसलूकी की थी। इस घटना के बाद एयरलाइन ने आरोपी व्यक्ति पर दो साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था। हाल ही में फ्लाइट में बदसलूकी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यहां तक कि यात्रियों पर पेशाब करने के भी कई मामले में आ चुके हैं। इसी महीने 11 मई को नशे की हालात में एक महिला यात्री ने दिल्ली-कोलकाता की इंडिगो की फ्लाइट में क्रू मेंबर के साथ बदतमीजी की थी। आरोपी महिला को कोलकाता एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ को सौंप दिया गया था।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस मामिदन्ना सत्य रत्न श्री रामचंद्र राव को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। बीते कल केंद्रीय कानून मंत्रालय ने पांच न्यायाधीशों को विभिन्न उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया है। जारी अधिसूचना में बॉम्बे हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय विजयकुमार गंगापुरवाला को मद्रास हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। जबकि जस्टिस देवकीनंदन धानुका को बॉम्बे हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। जस्टिस धानुका वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश हैं। वह 30 मई को 62 वर्ष की आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त हो जाएंगे और प्रभावी रूप से उनका कार्यकाल मात्र चार दिनों का होगा। इसके अलावा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह को राजस्थान हाईकोर्ट, केरल हाईकोर्ट के जस्टिस सरस वेंकटनारायण भट्टी को उसी अदालत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में बीते एक साल जेल में बंद दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को सुप्रीम कोर्ट ने 6 हफ्तों की अंतरिम जमानत दे दी है। जैन को यह जमानत स्वास्थ्य आधार पर मिली है। दरअसल बीते कुछ दिनों से जैन की तबियत खराब थी और गुरुवार को वह जेल के वाशरूम में चक्कर खाकर गिर पड़े थे। इसके बाद उनको एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को उनकी जमानत को लेकर हुई सुनवाई में ईडी ने जमानत का विरोध किया था और एम्स के डॉक्टरों के एक स्वत्रंत मेडिकल बोर्ड से उनके स्वास्थ्य की जांच करवाने की मांग की थी। इसके बाद जैन के वकील ने कहा कि एक साल में उनका 35 किलो वजन गिर चुका है उनको मानवीय आधार पर जमानत दी जाए। सुनवाई के बाद कोर्ट ने सत्येंद्र जैन को 6 हफ्तों को अंतरिम जमानत दे दी है।
हिमाचल प्रदेश सरकार शानन पावर प्रोजेक्ट से पंजाब से वापस लेने का मन बना चुकी है। सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि लीज अवधि समाप्त होने के इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज 2 मार्च 2024 को समाप्त हो रही है और इसके बाद हिमाचल सरकार इसे संभालेगी। ब्रिटिश राज में मंडी के तत्कालीन राजा जोगिंदर सिंह ने शानन प्रोजेक्ट को 3 मार्च 1925 को 99 साल के लिए पंजाब को लीज पर दिया था। यह प्रोजेक्ट पावरकाम के अधीन 110 मेगावाट हाईड्रो बिजली पैदा करता है, जो पंजाब को काफी सस्ती पड़ती है। हालाँकि पंजाब सरकार की लचर कार्यशैली के चलते ये प्रोजेक्ट जर्जर हालत में है और पंजाब सरकार इसका रखरखाव एक किस्म से बंद चुकी है। अब जल्द ये प्रोजेक्ट हिमाचल के अधीन होगा और इस बाबत सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पंजाब के मुख्यमंत्री से सहयोग की अपील भी की है।
नकली दवाओं की आपूर्ति के आरोप में हुई थी गिरफ्तार बद्दी स्थित एक फार्मा कंपनी की महिला प्रबंधक को ड्रग विभाग (राज्य औषधि नियंत्रक विभाग के अधीन) ने नकली दवा की सप्लाई करने के मामले में गिरफ्तार किया है। विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कंपनी को सीज कर मौके पर मिली दवाओं को कब्जे में ले लिया है। कार्रवाई के बाद बुधवार को आरोपी महिला प्रबंधक को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे तीन दिन के रिमांड पर भेजा गया है। मिली जानकारी के अनुसार आरोप है कि कंपनी की महिला प्रबंधक ने करीब सात करोड़ की नकली दवाएं दूसरे राज्यों में सप्लाई की थी। इसके बाद विभाग की टीम ने जांच आगे बढ़ाते हुए बद्दी की संबंधित फार्मा कंपनी की प्रबंधक को गिरफ्तार किया, साथ ही कंपनी में तैयार दवाओं और मशीनरी को भी सीज कर दिया गया है।
7 फीट 5 इंच लंबाई, 110 किलो वजन, 81 किलो का भारी-भरकम भाला, छाती पर 72 किलो वजनी कवच और सबसे ख़ास बात, युद्ध कौशल, स्वाभिमान और साहस ऐसा कि दुश्मन भी कायल थे। कहते हैं कि महाराणा प्रताप अपने पास हमेशा दो तलवार रखते थे,ताकि अगर कोई निहत्था दुश्मन मिले तो एक तलवार उसे दे सकें, क्योंकि वे निहत्थे पर वार नहीं करते थे। ये वो दौर था जब मुगल सलतनत के बादशाह अकबर ने लगभग पूरे हिन्दुस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और एक-एक कर सभी राजपूत राजा उसके अधीन होते जा रहे थे। अकबर ने न केवल बल से राजपूतों को झुकाया बल्कि जो राजपूत राजा उसका साथ नहीं देना चाहते थे, उनके साथ वो रिश्ता जोड़ लिया। जयपुर के राजा मानसिंह की फूफी से अकबर ने विवाह कर लिया और इस फेहरिस्त में अनेक राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगलों से रोटी -बेटी सम्बन्ध बनाने में अपनी भलाई समझी। पर महाराणा प्रताप अलग मिटटी के बने थे, महाराणा तो स्वाभिमान से गुथी मिट्टी के बने थे। अकबर ने कई बार प्रयास किया की प्रताप को वो अपने अधीन कर ले, लेकिन राजपूताना स्वाभिमान के आगे उसे हर बार मिली तो केवल शिकस्त। करीब 30 सालों तक लगातार कोशिश के बाद भी अकबर उन्हें बंदी नहीं बना सका था। " जिस राज़पूत ने मुगल के हाथ में अपनी बहन को दिया है, उस मुगल के साथ उसने भोजन भी किया होगा, सूर्यवंशीय बप्पा रावल का वंशधर उसके साथ भोजन नहीं कर सकता।” ये शब्द थे राजा मान सिंह को महाराणा प्रताप के और इस अपमान को मान सिंह सहन नहीं कर सका। वह तुरन्त दिल्ली को निकला और फिर बादशाह अकबर को भड़काया। उधर अकबर इसी प्रतीक्षा में बैठा था कि राणा से युद्ध कर उसे नीचा दिखाया जाये, सो एक विशाल सेना के साथ राजा मान सिंह और सलीम मेवाड़ भूमि की ओर निकल पड़े। महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर के बीच हल्दीघाटी में भयंकर युद्ध हुआ और बाकि इतिहास हैं। महाराणा प्रताप की करीब बीस हज़ार की सेना अकबर की 80 हजार सैनिकों वाली विशाल सेना के सामने जमकर लड़ी। बताते हैं कि ये युद्ध तीन घंटे से अधिक समय तक चला था और इस युद्ध में जख्मी होने के बावजूद महाराणा मुगलों के हाथ नहीं आए। महाराणा प्रताप कुछ साथियों के साथ जंगल में जाकर छिप गए और यहीं जंगल के कंद-मूल खाकर लड़ते रहे। हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप को मेवाड़-भूमि को मुक्त करवाने के लिये अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। महाराणा प्रताप को बारह वर्ष तक कंद मूल खाकर जंगलों और अरावलियों की पहाड़ियों में छिप छिप कर दिन व्यतीत करने पड़े। ऐसी विषम परिस्थिति में भी महाराणा को कभी-कभी अकबर की सेना का मुकाबला करना पड़ता था। उनके साथ छोटे छोटे बच्चे व महारानी भी थी। उधर अकबर राणा को पकड़ने की ताक में था परन्तु उसकी ये हसरत कभी पूरी नहीं हुई। महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ बीहड़ जंगलों में घास की रोटी खाकर जीवन निर्वाह करते थे। घास की बनी रोटियां खाते छोटे -छोटे बच्चे और उन रोटियों को भी कभी कभी वन के बिलांव छीनकर ले जाते। परन्तु महाराणा अपने प्रण पर अडिग थे और लक्ष्य था केवल और केवल मेवाड़ भूमि को बंधनों से मुक्त करने का। साथ मिला मेवाड़ भूमि के सच्चे सेवक भामाशाह का जिन्होंने सबकुछ महाराणा के चरणों में अर्पित कर दिया। मुगल सेना से छापामार युद्ध चलता रहा और इस बीच भामाशाह ने देशहित अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उधर महाराणा के हृदय में पुन: साहस की लहर दौड़ पड़ी और बिखरी सेना को संगठित कर उन्होंने कई किलो पर फिर अधिकार कर लिया। हालाँकि अपने प्रिय चित्तौड़ के किले को मुक्त न करा सके। इस बीच महाराणा का स्वास्थ्य ख़राब होता गया और उनको मृत्यु शैय्या पर सोना पड़ा। महाराणा प्रताप का निधन 19 जनवरी 1597 को हुआ था। कहा जाता है कि इस महाराणा की मृत्यु पर अकबर की आंखें भी नम हो गई थीं। उनके 17 पुत्रों में से अमर सिंह महाराणा प्रताप के उत्तराधिकारी और मेवाड़ के 14वें महाराणा बने। मृत्यु पूर्व उन्होंने अपने पुत्र और वीर सामंतों को बुला कर कहा था, वीर सपूतों दृढ़ संकल्प करो कि मेरे मरने के बाद मेरी प्रतिज्ञा को पूर्ण करोगे और सम्पूर्ण मेवाड़ की भूमि को स्वतन्त्र कराओगे। युद्धभूमि छोड़ भागा था शहजादा सलीम : हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप अपने शत्रु मान सिंह की खोज कर रहे थे। तभी उनके सामने अकबर का बड़ा पुत्र शहजादा सलीम आ गया। महाराणा ने भाला उठाया और अपने प्यारे घोड़े चेतक को सलीम की ओर चलाया। उनका प्यारा घोड़ा चेतक भी किसी वीर योद्धा से कम न था और महाराणा का इशारा पाकर वह सलीम के हाथी पर भी चढ़ गया। हालांकि महाराणा प्रताप के भीषण वार से महावत व शरीर रक्षक गण तो मारे गये, लेकिन भाग्यवश सलीम बच गया। महावत के गिरते ही निरंकुश होकर हाथी शहजादा सलीम को लेकर भाग गया। उधर महाराणा प्रताप ने भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। कहते हैं शहजादे को बचाने के लिए अगणित सेना ढाल बनकर वार करने लगी। पर निडर महाराणा प्रताप ने हज़ारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। मुगल सेना को राजपूतों के भीषण वारों से छठी का दूध याद दिला था, लेकिन राजपूत सेना संख्या में बहुत कम थी। धीरे धीरे महाराणा की सेना निर्बल होने लगी। उधर राजा मानसिंह की खोज करते करते महाराणा प्रताप शत्रु सेना में घुस गए। राणा के परन्तु मस्तक पर मेवाड़ राजछत्र- लगा हुआ था, जिसे देख कर मुगल सेना ने इनको घेर लिया। महाराणा संकट में थे। उनके साथ न कोई सामन्त था और न कोई सरदार। इस बीच “जय महाराणा प्रताप की जय” का घोष करते हुए वीरवर भालांपति मन्नाजी झपटते हुये सेना सहित महाराणा प्रताप की सहायता को पहुंचे। मन्नाजी ने महाराजा से ऐसे संकट के समय राजचिन्ह देकर वहां से निकल जाने की प्रार्थना की। महाराणा बोले ” मन्नाजी ! रण में पीठ दिखाना राजपूत का काम नहीं और यह कायरता पूर्ण कार्य मैं नहीं कर सकता। मात्रभूमि की रक्षा के लिए में अन्तिम श्वास तक लड़ता रहूंगा। " पर मन्नाजी ने कहा कि हिन्दुओं की रक्षा के लिए, मेवाड़ भूमि को स्वतंत्रता के लिए, यह आवश्यक है कि वे प्राणों की बलि न दें, हम आपको रण से नहीं हटा रहे वरन् निरन्तर मुगलों (विदेशियों ) से युद्ध करने के लिए यहां से इस समय अलग कर रहे हैं। आखिरकार महाराणा मान गए और वहां से अलग हो गये। राणा ने अपना छतर और झण्डा झालाजी को दे दिया। इधर वीरवर मन्नाजी को ही राणा समझ कर मुगल सैनिक उन पर टूट पड़े। मन्नाजी ने प्रचएंड युद्ध कौशल दिखाया परंतु, विशाल सेना का मुकाबला न कर सके ओर कई मुगल सैनिकों को मार कर स्वयं भी मातृभूमि की गोद में हमेशा के लिए सो गये। दौड़ रहा अरिमस्तक पर, वह आसमान का घोड़ा था ..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक उनका विश्वासपात्र था, मनुष्यों के सम्मान बुद्धि रखता था और इशारा पाते ही हवा से बातें करने लगता था। चेतक एक महान योद्धा था। हल्दीघाटी के युद्ध में हजारों दुश्मनों ने महाराणा को रोकने के लिए,उन पर आक्रमण करने के लिए चेतक पर प्रहार किये परन्तु हवा से बातें करता चेतक जख्मी होकर भी न रुका और अपने प्रिय राजा को लेकर मुगल सेना के बीचोंबीच से सुरक्षित निकाल ले गया। उधर दो पठान सरदारों ने भी दल बल सहित महाराणा का पीछा किया। इसी बीच महाराणा प्रताप सिंह का छोटा भाई शक्ति सिंह, जो मुगलों में जा मिला था, सबकुछ देख रहा था। राणा के प्राणों को संकट में देख कर उसका ममत्व जाग पड़ा। भाई को रक्षार्थ उसने पठान सैनिकों का पीछा किया और उन सैनिकों को काल के घाट उतार दिया। शक्तिसिंह ने महाराणा प्रताप को रुकने के लिए कहा किन्तु महाराणा को भरोसा नहीं था सो उन्होंने उसकी एक नहीं सुनी और नाला पार करने तक घोड़े पर दौड़ते रहें। जब नदी पार करली तो घायल घोड़ा थक चुका था। चेतक महाराणा को पीठ पर लिए 26 फीट का नाला एक छलांग में लांघ गया था। नाला पार कर महाराणा जैसे ही घोड़े से उतरे तो पीछे भाई शक्तिसिंह खड़ा था। महाराणा ने कहा “भाई शक्ति ! तुम अब भी मेरे प्राणों के पीछे पड़े हो। लो आज अपने हाथों से ही इस प्रताप का अन्त कर दो, सारा मेवाड़ उजड़ चुका है और आँखें उजड़े हुए मेवाड़ को नहीं देखता चाहती”। शक्तिसिंह महाराणा के चरणों में गिरकर बिलख बिलख कर रोने लगे और अपने अपराध की क्षमा मांगी। उधर महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक सदा के लिए जैसे विदाई मांग रहा था। चेतक के प्राण-पखेरू उड़ गये और महाराणा प्रताप फूट- फूट कर रोने लगे। जिसने पूरी मुगल सेना को काल दिखा दिया वो वीर महाराणा भी भावुक थे। शक्तिसिंह ने उन्हें संभाला और अपना घोड़ा राणा को दे दिया। कवी श्यामनारायण पाण्डेय ने अपनी उत्कृष्ट काव्यसर्जना हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े सभी प्रसंगों को समेटा हैं। चेतक पर भी उन्होंने एक कविता लिखी हैं जिसका शीर्षक हैं 'चेतक की वीरता' चेतक की वीरता... रणबीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग ∼ श्याम नारायण पाण्डेय इसलिए दो बार मनाई जाती हैं जयंती : महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के मेवाड़ में हुआ था। वहीं ज्योतिष पंचांग की मानें तो उनका जन्म ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन पुष्य नक्षत्र में हुआ था, जो विक्रम संवत 2080 में आज के दिन है। यही कारण है कि कुछ ही दिनों के अंतराल पर वीर महाराणा प्रताप की जयंती दो बार मनाई जाती है। राजपूत राजघराने में जन्म लेने वाले प्रताप उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र थे। महाराणा प्रताप ने मुगलों के बार-बार हुए हमलों से मेवाड़ की रक्षा की। उन्होंने अपनी आन, बान और शान के लिए कभी समझौता नहीं किया। विपरीत से विपरीत परिस्थिति ही क्यों ना, कभी हार नहीं मानी। यही वजह है कि महाराणा प्रताप की वीरता के आगे किसी की भी कहानी टिकती नहीं है। 11 शादियां की, 17 बेटे थे : महाराणा प्रताप के निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने कुल 11 शादियां की थी। इन शादियों में उनके 17 बेटे और 5 बेटियां थी। महारानी अजाब्दे के बेटे अमर सिंह ने महाराणा प्रताप के बाद राजगद्दी संभाली। एक इतिहासकार के मुताबिक, महाराणा प्रताप के 24 भाई और 20 बहनें थीं। खुद प्रताप के सौतेले भाई ने उन्हें धोखा देते हुए अजमेर आकर अकबर से संधि कर ली थी। बचपन में महाराणा प्रताप को कीका नाम से पुकारा जाता था। वह जब युद्ध के लिए जाते थे, तो 208 किलोग्राम की दो तलवारें, 72 किलोग्राम का कवच और 80 किलो के भाले लेकर जाते थे।
हिमाचल प्रदेश में सत्ता गवाने के करीब पांच महीने बाद भाजपा को कर्नाटक में भी हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा सरकार की कर्नाटक से विदाई हो गई है और निसंदेह ये पार्टी के लिए बड़ा झटका है। उधर कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की है और 130 प्लस के आंकड़े के साथ सत्ता में वापसी की है। कर्नाटक की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है और ऐसे में 'किंगमेकर' बनने का ख्वाब देख रही जेडीएस को भी बड़ा झटका लगा है। कर्नाटक में कांग्रेस ने कई मुद्दों पर भाजपा को पीछे छोड़ दिया। फिर चाहे वो भ्रष्टाचार का मुद्दा हो या ध्रुवीकरण का। बजरंग दल पर बैन की बात करके मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया। वहीं, 75 प्रतिशत के आरक्षण का दांव चलकर भाजपा के हिंदुत्व के कार्ड को फेल कर दिया। कांग्रेस ने कर्नाटक में दलित, ओबीसी, लिंगायत, हर तबके वोटर्स को अपने पाले में करने में कामयाबी हासिल की। कर्नाटक में 224 सदस्यीय विधानसभा के लिए 10 मई को रिकॉर्ड 73.19 प्रतिशत मतदान हुआ था ,जिसे सत्ता विरोधी लहर के साथ जोड़ कर देखा जा रहा था। हुआ भी ऐसा ही और कर्नाटक की जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। इसके साथ ही राज्य में चला आ रहा सत्ता परिवर्तन का रिवाज भी कायम रहा। उधर, देशभर में राजनीतिक संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए कर्नाटक जीत बड़ी है। एक के बाद एक लगातार हार रही देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए पहले हिमाचल प्रदेश और अब कर्नाटक चुनाव संजीवनी साबित हो सकते है। इसी वर्ष के अंत में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भी है, ऐसे में कर्नाटक की जीत पार्टी का मनोबल बढ़ानी वाली है। वहीँ लोकसभा में भी कर्नाटक की 28 सीटें है, उस लिहाज से भी कांग्रेस के लिए ये सुखद संकेत जरूर है। वहीँ भाजपा के लिए कर्नाटक की हार आत्ममंथन का संदर्भ जरूर है। पार्टी को ये समझना होगा कि सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर राज्यों के चुनाव नहीं जीते जा सकते है। भाजपा को स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों की अहमियत भी समझना होगा। पीएम मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ जैसे पार्टी के बड़े चेहरों ने कर्नाटक में पूरी ताकत झोंकी और इनके कार्यक्रमों में भीड़ भी उमड़ी, लेकिन ये भी वोटों में तब्दील नहीं हुई। नतीजे बयां करते है कि कर्नाटक चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण पर जमीनी मुद्दे भारी पड़े है। 'बजरंगबली' और 'दी केरल स्टोरी' जैसे मुद्दों पर जनता ने आम मुद्दों को तरजीह दी और इसी की बिसात पर कांग्रेस को सत्ता नसीब हुई। बहरहाल कांग्रेस के लिए ये पिछले 6 महीने में दूसरी बड़ी जीत है और पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल निसंदेह इस जीत से बढ़ेगा। कर्नाटक में भी रिवाज बरकरार : कर्नाटक में 38 साल से सत्ता रिपीट नहीं हुई है। आखिरी बार 1985 में रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने सत्ता में रहते हुए चुनाव जीता था। वहीं, पिछले पांच चुनाव (1999, 2004, 2008, 2013 और 2018) में से सिर्फ दो बार (1999, 2013) सिंगल पार्टी को बहुमत मिला। भाजपा 2004, 2008, 2018 में सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसने बाहरी सपोर्ट से सरकार बनाई। रिकॉर्ड मतदान, पिछले चुनाव से 1% ज्यादा 10 मई को 224 सीटों के लिए 2,615 उम्मीदवारों के लिए 5.13 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाले। चुनाव आयोग के मुताबिक, कर्नाटक में 73.19% मतदान हुआ है। यह 1957 के बाद राज्य के चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा है। भाजपा ने ऐसी बनाई थी सरकार : 2018 में भाजपा ने 104, कांग्रेस ने 78 और जेडीएस ने 37 सीटें जीती थी। किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। भाजपा से येदियुरप्पा ने 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन सदन में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 23 मई को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार बनी। 14 महीने बाद कर्नाटक की सियासत ने फिर करवट ली। कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायकों की बगावत के बाद कुमारस्वामी को कुर्सी छोड़नी पड़ी। इन बागियों को येदियुरप्पा ने भाजपा में मिलाया और 26 जुलाई 2019 को 119 विधायकों के समर्थन के साथ वे फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2 साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया।
'कर्नाटक में 2004, 2008 और फिर 2018 में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। 2013 में कांग्रेस ने 122 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। सूबे में मुख्य लड़ाई लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रही है। कांग्रेस ने कई बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई है, जबकि भाजपा को कभी भी पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। कांग्रेस की इस जीत के पीछे कई बड़े कारण है। 1. आरक्षण का वादा दे गया फायदा : कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण खत्म करके लिंगायत और अन्य वर्ग में बांट दिया। पार्टी को इससे फायदे की उम्मीद थी, लेकिन ऐन वक्त में कांग्रेस ने बड़ा पासा फेंक दिया। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 फीसदी करने का एलान कर दिया। आरक्षण के वादे ने कांग्रेस को बड़ा फायदा पहुंचाया। 2. खरगे का अध्यक्ष बनना : ये भावनात्मक तौर पर कांग्रेस को फायदा दे गया। कांग्रेस ने चुनाव से पहले मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। खरगे कर्नाटक के दलित समुदाय से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस ने खरगे के जरिए भावनात्मक तौर पर कर्नाटक के लोगों को पार्टी से जोड़ दिया। 3. राहुल गांधी की यात्रा : राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से जम्मू कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी। इस यात्रा का सबसे ज्यादा समय कर्नाटक में ही बीता। ये राहुल गांधी की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा रहा। इस यात्रा के जरिए राहुल ने कर्नाटक में कांग्रेस को मजबूत किया। 4 नहीं बंटा मुस्लिम वोट : एक वजह ये भी मानी जा रही है कि कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोट बीजेपी के खिलाफ पीएफआई और बजरंग बली के मुद्दे पर एकजुट हो गया। एकमुश्त मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिला। 5 प्रियंका गाँधी रही हिट : कर्नाटक में राहुल गांधी से ज़्यादा प्रियंका गांधी ने प्रचार किया। प्रियंका ने 35 रैलियां और रोड शो किए। दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस ने प्रियंका को उतारकर नया प्रयोग किया और उनको इंदिरा गांधी से जोड़कर प्रेजेंट किया, इसका फायदा मिला। 6 मजबूत स्थानीय नेतृत्व : इस चुनाव में कांग्रेस का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट रहे हैं रीजनल लीडर और लोकल मुद्दे। कांग्रेस ने चुनाव में क्षेत्रीय नेताओं को आगे रखा और जमीनी मुद्दों को अपने एजेंडे में रखा, जो वोटों में परिवर्तित हुआ। कांग्रेस को बड़े मार्जिन से जीत मिली है।
चुनाव प्रचार के दौरान ही कर्नाटक चुनाव की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई थी। इस बार चुनाव में भाजपा बैकफुट पर नजर आ रही थी और कांग्रेस काफी आक्रामक थी। ऐसे में भाजपा की इस हार का मतलब साफ है। 1 मजबूत चेहरा न होना: कर्नाटक में बीजेपी की हार का बड़ा कारण मजबूत चेहरे का न होना माना जा रहा रहा है। दरअसल पार्टी ने येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को आगे बढ़ाया लेकिन वे कोई कमाल नहीं कर सके। दूसरी तरफ कांग्रेस में कई दमदार चेहरे है जो फ्रंट फुट से पार्टी को लीड करते दिखे। 2 भ्रष्टाचार के आरोपों ने पहुंचाया नुकसान : ये मुद्दा पूरे चुनाव में हावी रहा। चुनाव से कुछ समय पहले ही भाजपा के एक विधायक के बेटे को रंगे हाथों घूस लेते हुए पकड़ा गया था। इसके चलते भाजपा विधायक को भी जेल जाना पड़ा। एक ठेकेदार ने भाजपा सरकार पर 40 प्रतिशत कमिशनखोरी का आरोप लगाते हुए फांसी लगा ली थी। कांग्रेस ने इस मुद्दे को पूरे चुनाव में जोरशोर से उठाया। 3 नहीं चला ध्रुवीकरण का दांव : कर्नाटक में एक साल से बीजेपी के नेता हलाला, हिजाब से लेकर अजान तक के मुद्दे उठाते रहे। चुनाव के दौरान बजरंगबली और दी केरल स्टोरी मुद्दे बनाये गए, लेकिन जनता ने जमीनी मुद्दों पर वोट किया। 4 . आरक्षण का मुद्दा पड़ा भारी : कर्नाटक में भाजपा ने चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण खत्म करके लिंगायत और अन्य वर्ग में बांट दिया। पार्टी को इससे फायदे की उम्मीद थी, लेकिन ऐन वक्त में कांग्रेस ने बड़ा पासा फेंक दिया। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 फीसदी करने का ऐलान कर दिया। 5 . टिकट बंटवारे ने बिगाड़ा बाकी खेल : भाजपा में टिकट बंटवारे को लेकर भी बड़ी चूक हुई। पार्टी के कई दिग्गज नेताओं का टिकट काटना भाजपा को भारी पड़ा। पार्टी नेताओं की बगावत ने भी कई सीटों पर भाजपा को नुकसान पहुंचाया है। करीब 15 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जहां भाजपा के बागी नेताओं ने चुनाव लड़ा और पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया। 6. दक्षिण बनाम उत्तर की लड़ाई का भी असर : इसे भी एक बड़ा कारण मान सकते हैं। इस वक्त दक्षिण बनाम उत्तर की बड़ी लड़ाई चल रही है। भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है और मौजूदा समय केंद्र की सत्ता में है। ऐसे में भाजपा नेताओं ने हिंदी बनाम कन्नड़ की लड़ाई में मौन रखना ठीक समझा। वहीं, कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने मुखर होकर इस मुद्दे को कर्नाटक में उठाया।
कर्नाटक में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और पार्टी ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री कौन होगा इसे लेकर भी माथपच्ची शुरू हो गई है। सीएम पद की रेस में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार सबसे आगे हैं और इन दोनों में से किसी एक नेता का चुनाव पार्ट के लिए सरदर्द साबित हो सकता है। सिद्धारमैया ज्यादा अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं और उनके पास सरकार चलाने का अनुभव है, जबकि डीकेएस चुनौती देने वाले नेता हैं और सोनिया गांधी करीबी हैं। ऐसे में आलाकमान के लिए फैसला मुश्किल होने वाला है। वैसे माहिर मान रहे है कि अगर सभी विधायकों के बहुमत के साथ भी फैसला लिया जाता है तो सिद्धारमैया अधिक स्वीकार्य मुख्यमंत्री चेहरा हो सकते है। सिद्धारमैया : बड़ा कद, लम्बा राजनैतिक अनुभव राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता सिद्धारमैया को फिर से मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। सिद्धारमैया साल 2013 से लेकर साल 2018 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं। ऐसे में सिद्धारमैया पार्टी की पहली पसंद हो सकते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने कार्यकाल के दौरान कई सामाजिक-आर्थिक सुधार योजनाएं शुरू की थी जिन्होंने उन्हें आर्थिक कमजोर वर्ग के बीच ख़ासा लोकप्रिय बनाया। पर अपनी पिछली सरकार के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे फैसले भी लिए थे जिनसे लिंगायत, विशेष रूप से हिंदू वोटरों के बीच में उनकी लोकप्रियता घटी, मसलन टीपू सुल्तान को इतिहास से हटाकर उनका महिमामंडन करना, जेल से आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे पीएफआई और एसडीपीआई के कई कार्यकर्ताओं को रिहा करना इत्यादि। 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी उनके नेतृत्व में रिपीट करने में कामयाब नहीं रही थी जिसके बाद कांग्रेस ने जेडीएस के साथ गठबंधन सरकार बनाई। हालाँकि वो सरकार महज एक साल ही चल सकी। अब दोबारा बहुमत मिलने पर क्या कांग्रेस फिर सिद्धारमैया को सीएम पद सौपेंगी, ये देखना रोचक होगा। डीके शिवकुमार: प्रदेश अध्यक्ष, कमतर नहीं दावा चुनाव नतीजे के एक दिन पहले ही डीके शिवकुमार ने एक ट्वीट किया है, जिससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि डीके शिवकुमार की दावेदारी कम नहीं है। दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से ठीक एक दिन पहले डीके शिवकुमार ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी तीन सालों की मेहनत का ट्रेलर का वीडियो साझा करते हुए, एक किस्म से अप्रत्यक्ष तौर पर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश कर दी है। डीके शिवकुमार कनकपुरा सीट से लगातार 9वीं बार विधायक हैं। इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हराने में शिवकुमार की अहम् भूमिका है। हालाँकि मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी के आरोप में उन्हें साल 2019 में दिल्ली के तिहाड़ जेल में दो महीने बिताने पड़े थे। शिवकुमार कई बार कह चुके है कि जेल में रहने के दौरान उनके साथ नियम पुस्तिका के खिलाफ सबसे कठोर व्यवहार किया गया था क्योंकि उनकी गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध थी। अब कांग्रेस क्या राज्य के सबसे अनुभवी नेता माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर उन्हें वरीयता देगी, इस पर सबकी निगाह टिकी है। सरप्राइज की सम्भावना भी खारिज नहीं ! कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी कर्नाटक से आते है और खरगे के नाम को लेकर भी कयास लगते रहे है। कर्नाटक कांग्रेस में दो ताकतवर गुट यानी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार गुट आमने- सामने है और दोनों नेताओं के समर्थक खुलकर एक दूसरे पर वार करते नजर आए हैं। दोनों नेताओं के बीच खींचतान बनी हुई है, ऐसे में क्या खरगे सरप्राइज हो सकते है, ये देखना रोचक होगा। हालाँकि इसकी संभावना कम है पर राजनीति में कुछ भी मुमकिन होता है।
A Memorandum of Understanding (MOU) was recently signed between the HP government and Oil India Limited (OIL) for the production of compressed biogas (CBG) from pine needles present abundantly in Himachal through the process of bioconversion. Oil India Limited will perform trials to assess the viability of producing biofuel from pine needles, and samples for the same will be provided to the Research & Development Centre in Bengaluru through the HP Department of Energy. If the trial phase outcomes are satisfactory, both parties will work collaboratively to develop a new clean power generation source for the state. It has the potential to serve as an important turning point in Himachal's transition to a "Green Energy State" by 2026. "Oil India Limited has assured all-out support to develop a sustainable and new renewable energy system and will also promote R&D for the same," CM Sukhvinder Singh Sukhu stated. Crafting an Opportunity Out of a Problem Chir-Pine forest covers about 2841 Km2 and is the most dominant pure forest type in Himachal affected by forest fires yearly. The main reason for forest fires in Chir-pine forests is caused by their needles generating a dense mat of flammable material on the forest floor, which is also not readily biodegradable. Himachal's 1311 km2 of fire-prone territory and over 4000 documented forest fires in 2020-21 highlight a severe concern in the hands of the state government. The abundance of needles in the pine forest creates an ideal environment for forest fires throughout the summer months. In response, the Sukhu government has launched an innovative approach to produce CBG from pine needles via bioconversion process. This collaboration with OIL has the potential to kill two birds with one stone by addressing the issue of forest fires on the one hand and providing renewable energy on the other. In addition, it can create opportunities to generate jobs; previously, in March, a 50% subsidy for the establishment of a pine-based industry was announced. All of these actions demonstrate Sukhu Sarkar's commitment to resolving the forest fire problem and making Himachal a green state in the process. Can CBG Even Become a Reality? The viability of extracting CBG from pine needles will be known in the near future. Biogas is produced through the anaerobic digestion of organic wastes, and the cellulose (organic compound) content present in pine needles, is attributed to the biogas generation, which is quite high in pine needles, making it a good alternative for energy generation projects. Furthermore, grounded Pine needles make biogas production quicker and more efficient. Based on Jaypee University research, the production of biogas from pine needles ranged from 1.41 liters per day in the winter to 7.31 liters per day in the summer. The variation in biogas production is due to a change in the metabolic activity of microbes during the bioconversion process, which is higher in the summer and lower in the winter. Keeping all the above factors in mind, the initiative taken by the Sukhu government is visionary, although its ground reality will be visible after the introduction of CBG production in the state on a large scale if even found feasible. Also read: Go Green and Save Big: 50% Subsidy for Pine Leaf-based Industries in HP Himachal Pradesh Budget Session: Push for a "Green Energy State
Maharashtra forest officials retrieved seventeen tiger whiskers from three poachers in Nagpur. The accused were Maharashtra residents from Nagpur and Bhandara regions. The Forest Department acted after receiving word from their credible source that a tiger whisker sale was about to take place. Deputy Forest Conservator B S Hada added, "We were keeping a close eye on the accused." We closed in on the three culprits on May 1, apprehended them, and seized 17 whiskers." The origin of the tiger whiskers and the forest division to which they belong are being investigated. Illegal poachers have a high demand for tiger whiskers since they are utilized by godmen and tantriks, making it a very profitable business for them.
The ongoing construction of Noida international airport faces yet another obstacle after starting its construction in 2021. First, it was clearance issues, and now the construction company is facing the problem of ongoing wildlife intrusions. The major wildlife species found around the airport area are Indian Blackbuck, Nilgai, Jackels, wild cats, and the Sarus crane. The operator of the Noida airport, Yamuna International Airport Pvt Ltd (YIAPL), sent a letter to the state authorities requesting that wildlife be taken away from the project site as the animals hinder construction. This is the fourth letter from Feb 2022 to the local authorities by the construction agency. In the letter, the YIAPL CEO Christoph Schnellmann wrote, “Since full-fledged construction started at the site with manpower and machinery, it has affected the habitation of the animals. The presence of wildlife will also impede the smooth and unhindered progress of construction activities". Measures Proposed: The biodiversity action plan prepared by the WII, Dehradun, will be executed by state-concerned authorities. The Aviation Authority will ensure that the WII regulations are implemented smoothly. A new survey will be undertaken in order to carry out the evacuation strategy. The state forest department has proposed the construction of an animal rescue and rehabilitation centre with a budget of Rs 5 crores and an area of around 5 hectares. As per the WII report, the two keystone species that reside in and around the airport area are the Blackbuck and Sarus crane. In the survey of 1,334 hectares area, 258 blackbucks were reported, while 76 Sarus cranes were recorded in independent sightings. DFO Srivastava said, "The Forest department would conduct a fresh survey to ascertain the exact population of the wildlife around the project site for carrying out an evacuation plan". In addition, Yamuna Expressway Industrial Development Authority (YEIDA) CEO Arun Vir Singh had promised to provide all ground support for it.
Shimla, Himachal's oldest pre-independence municipality, will vote in municipal elections again on May 2, 2023. With elections approaching, the major political parties, BJP and Congress are extensively pursuing door-to-door campaigns, Nukad sabhas, and template distribution programs at the local level. With the BJP losing the HP state assembly election in 2022 and the Congress taking control Experts believes there is a strong chance for Congress to recapture Shimla MC. INC, the major political force in Himachal at the moment, appears to be certain of them winning the MC elections. With the momentum of the recent HP Vidhan Sabha election and CM Sukhu emerging as a powerful and authentic figure in Shimla's eyes. Furthermore, three incumbent MLAs, two of whom are cabinet ministers in the HP government, make Congress's chances fancy the forthcoming election. This advantage, however, comes with significant pressure to gain the Shimla region back after a long stretch, or it will be a major loss for the current Sukhu government. BJP, the former MC victor, is currently aggressively pursuing the campaign program. With significant BJP political faces are expected to visit Shimla's municipal region, demonstrating the BJP's determination to keep its political hold on the Municipal cooperation of Shimla. Additionally, their manifestos have good junctures with 21 announced vade containing guarantees and freebies (water and garbage bill). However, it will require considerable work from both local and state officials to make it happen. Since, Municipal Cooperation elections are mostly based on local issues, as well as the workability and relationship of the local ward councilor. BJP can give Congress run for the seats for the MC election to be held from May 2nd. Hence, the victory of either of the major parties in the municipal election is too early to predict in the current scenario and MC can go into either of the party's hands.
The Shimla Lok Sabha (LS) constituency of Himachal is gearing up for a major political battle in 2024. The parliamentary constituency is a reserved seat (SC) consisting of 17 Vidhan Sabha segments. In the 2019 LS elections, Suresh Kashyap from the BJP defeated Congress veteran Dhani Ram Shandil by over 3.56 lacs ballots. The 2024 Lok Sabha election for the Shimla constituency is anticipated to be fiercely contested. BJP aims to retain Shimla, while Congress is likely to take the opportunity of momentum created by victory in the recent state election and capture the LS seats from BJP after 15 years of BJP dominance in the Shimla LS seat. As the Congress won 13 of the 17 Vidhan Sabha seats in the recent state assembly elections, experts believe that it indicates a shift in the Shimla constituency's mentality from the BJP to the Congress. However, center politics differs from state politics to a great extent. To begin with, the BJP has stronger central leadership than the Congress, whose face, Rahul Gandhi, is currently involved in a legal tussle over statements he made about the Modi surname during a rally. However, as seen in the recent state election, the Modi effect has faded in Himachal, while Congress showing a significant voter base in the Shimla constituency this time, making the future election unpredictable. One of the key factors that could determine the outcome of the election is the choice of candidates. BJP tends to surprise people with its candidate selection every time. Potential candidates from BJP can be Suresh Kashyap (MP Shimla), Virender Kashyap (ex-MP), and Rajiv Seizal (ex-MLA). Congress could give the ticket to leaders like Vinod Sultanpuri (MLA HP), Mohan Lal Brakta (MLA HP), or Vinay Kumar (MLA HP). There is also the possibility of Dhani Ram Shandil (Cabinet Minister HP) being positioned for the LS election again. However, there is a likelihood that new faces from both parties, one with substantial support and relevance in the Shimla constituency, would enter the candidacy in the 2024 election. Another crucial factor that could play a significant role in the election is the issue of development, with both the BJP and Congress promising to address issues such as traffic congestion, waste management, and inadequate infrastructure. The battle for Shimla promises to be exciting as political parties prepare for the 2024 Lok Sabha elections. BJP even started its campaigning in January, while Congress put out an attractive state budget to win over voters this year. With both the BJP and the Congress going all out to capture the seat, it remains to be seen who will come out on top in this election.
Following the birth of two Cheetah cubs in March to parents Siyaya and Freddie in India, which were translocated from Nambia (South Africa) to the Indian national park Kuno (India) in September 2022. The world is watching to see if the Cheetah can thrive in India again after its extinction in the 1950s caused by overhunting and poaching. In February, 12 cheetahs were relocated from South Africa to India to introduce 50 cheetahs from various African countries into several Indian national parks as part of "Project Cheetah." First Indian Cheetah conservation specialist P Giradkar said, “Cheetah is the only animal in recorded history to become extinct from India due to unnatural causes. Therefore, scientific studies on the ecological interaction between habitat composition, habitat quality, and demography of cheetahs and their prey are required to maintain viability,” Giridkar told DW. She was satisfied with the birth of cubs and added, “Increases in the number of reproductive events with longevity are key processes that influence annual individual performance that follows multiple generations. Of course, reproductive success depends on phenotypic, environmental, and genetic factors.” Key concerns that could hinder the effective reintroduction of cheetahs in India: Inadequate Habitat area: Experts indicated that the birth of cubs in captivity doesn’t indicate the success of the project. The major problem for effective rehabilitation is the appropriate habitat area for the wild cat's natural life cycle. Cheetahs, being solitary cats, require approximately 9800 Km2 for mating and survival. Wildlife biologist Ravi Chellam also showed concern and said, “India has erred…by bringing the cats much before habitats of adequate size and quality were ready. This prolonged captivity will have negative impacts on the cats. I sincerely hope that we do not import more cheetahs from Africa until we have secure and good quality habitats to host them.” Diseases and health issues: Recently, right before the birth of cubs, a female Cheetah (Sasha) died in captivity of Kidney disease. According to experts, the birth of cubs does not signify project success. Similarly, an individual's death does not reflect failure. However, this death foreshadows upcoming challenges that, if not controlled effectively, could lead to the project's downfall. Upcoming challenges for the project: The Cheetahs are currently in captivity, but once released into the wild, they will encounter a variety of issues. "Human-wildlife conflict, loss of habitat, prey population, poaching, and illegal wildlife trafficking, with cubs being taken for smuggling into the exotic pet trade" are among the issues.
देश में कोरोना के मामले लगातार बढ़ते जा रहे है। बताया जा रहा है कि पिछले 24 घंटों में देश में कोरोना के पांच हजार से ज्यादा यानी 5,335 मामले सामने आए हैं। इसी के साथ देश में सक्रिय मामलों की संख्या 25,587 हो गई है। बता दे कि एक दिन पहले 163 दिन बाद चार हजार से ज्यादा लोग एक दिन में कोरोना संक्रमित मिले थे। बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया था कि मंगलवार को देश में 4,435 लोग संक्रमित पाए गए। इसी के साथ सक्रिय केस की संख्या 23,091 पहुंच गई है। संक्रमण से 15 लोगों ने जान गंवा दी थी। महाराष्ट्र और केरल में चार-चार और छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, पुडुचेरी व राजस्थान में एक-एक कोरोना संक्रमित की मौत हुई थी। अब तक संक्रमण के चलते कुल पांच लाख 30 हजार 916 मौतें हो चुकी हैं।
देश में कोरोना के मामले लगातार बढ़ते जा रहे है। बताया जा रहा है कि पिछले 24 घंटों में देश में कोरोना के पांच हजार से ज्यादा यानी 5,335 मामले सामने आए हैं। इसी के साथ देश में सक्रिय मामलों की संख्या 25,587 हो गई है। बता दे कि एक दिन पहले 163 दिन बाद चार हजार से ज्यादा लोग एक दिन में कोरोना संक्रमित मिले थे। बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया था कि मंगलवार को देश में 4,435 लोग संक्रमित पाए गए। इसी के साथ सक्रिय केस की संख्या 23,091 पहुंच गई है। संक्रमण से 15 लोगों ने जान गंवा दी थी। महाराष्ट्र और केरल में चार-चार और छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, पुडुचेरी व राजस्थान में एक-एक कोरोना संक्रमित की मौत हुई थी। अब तक संक्रमण के चलते कुल पांच लाख 30 हजार 916 मौतें हो चुकी हैं।
Department of Computer Science and Engineering, School of Engineering, Design and Automation, GNA University organized a National Seminar on "Entrepreneurial Intention, Innovation, and Invention". Er. Amardev Singh from NITTTR, Chandigarh was the resource person for this National Seminar. The objective of this seminar was to raise awareness about Entrepreneurship Skills. Er. Singh discussed various models of Entrepreneurship along with various seed money schemes. He also elaborated on how three things are connected: Desire, Ability, and Human Behaviour. He even showcased various prototypes and business ideas, and the ways to make them possible in reality. More than 200 students participated in this seminar. Dr. Vikrant Sharma, Professor, and Dean-SEDA welcomed all the participants and experts of the Seminar. It was an interactive session where students actively interacted with the resource person and also saw various prototypes and learned steps to become a successful entrepreneur. S. Gurdeep Singh Sihra, the Pro-Chancellor, of GNA University congratulated all the participants. He said, “I am elated that the students should focus on these skills as better to become job providers than job seekers.” Dr.VKRattan, the Vice–Chancellor, of GNA University appreciated all the participants and encouraged them to take part in such events. Dr. Monika Hanspal, Dean of Academics, GNA University interacted with participants and highlighted the significance of entrepreneurship skills. Dr. Hemant Sharma, the Pro Vice-Chancellor thanked the management for providing a platform of learning for the students and staff. He also thanked Dr. Anurag Sharma, Professor, Head CSE, and the organizers for organizing such a great event and ensured all participants that such events will be planned in the future also to promote entrepreneurship culture.
देश में कोरोना की लहर दौड़ रही है। दिन प्रतिदिन लोगों के लिए यह चिंता का विषय बन चुका है। बीते 24 घंटे में कोरोना के 3038 नए मामले सामने आए हैं। इस दौरान 2069 लोग ठीक हुए हैं, जबकि 9 मरीजों की मौत हुई है। पिछले एक महीने से नए मामले में 9 गुना बढ़ोतरी हुई है। 3 मार्च को 334 नए मामले सामने आए थे, जबकि 29 मार्च के बाद से रोजाना 3 हजार से ज्यादा केस सामने आ रहे हैं। नए केस में बढ़ोतरी के चलते पिछले एक महीने में एक्टिव केस में भी साढ़े 7 गुना की बढ़ोतरी हुई है। 3 मार्च को एक्टिव मरीजों की संख्या 2 हजार 686 थी,बीते कल यह संख्या बढ़कर 21 हजार 179 हो गई है। यह संख्या अक्टूबर के बाद सबसे ज्यादा है। इससे पहले 23 अक्टूबर को एक्टिव केस 20 हजार 601 थे। उधर, छत्तीसगढ़ के एक गर्ल्स हॉस्टल में सोमवार को 19 छात्राएं संक्रमित पाई गई हैं। सभी को क्वारैंटाइन किया गया है। इन छात्राओं के संपर्क में आने वाली दूसरे छात्रों की भी जांच की जा रही है। 22 फरवरी को देश में सिर्फ 2 हजार एक्टिव केस थे, जो 2 अप्रैल को 20 हजार से ज्यादा हो गए। यानी सिर्फ 40 दिन में कोरोना के एक्टिव केस में 900% का इजाफा हो गया है। कल यानी सोमवार को एक्टिव केस 21 हजार से ज्यादा हो गए। हिमाचल प्रदेश यहां 318 नए केस मिले हैं, 157 लोग ठीक हुए हैं और 171 लोगों का इलाज चल रहा है। रविवार को यहां 94 नए केस दर्ज किए गए थे। यहां पॉजिटिविटी रेट 6.40% है।


















































